देश के कोने-कोने में जिस तरह की घटनाएं घट रही हैं, उन्हें देखकर आसानी से यह कहा जा सकता है कि हमारे देश में आंतरिक तौर पर हलचल है। कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने की घटनाएं बढ़ रही है। भीड़ हर खतरे से बेपरवाह अपना निर्णय सुना दे रही है। अचानक देशभर में ऐसी हिंसक घटनाओं की झड़ी लग गई है, जिनमें आम लोग कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं, इस साल बिहार के वैशाली जिले में 13 सितंबर को लोगों की एक भीड़ ने 10 व्यक्तियों को पीट-पीटकर मार दिया। इनके बारे में संदेह था कि वे चोर हैं। इसके एक सप्ताह के भीतर ही दो और लोगों को पटना के सुलतानगंज इलाके में पीट-पीटकर मार डाला गया। महाराष्ट्र के लोनावाला में पांच मजदूरों को मामूली से पैसों के झगड़े में मार डाला गया। केरल में भीड़ ने चोरी के संदेह में दो महिलाओं पर हमला कर दिया। इन महिलाओं में से एक गर्भवती थी और एक उसकी बेटी थी। प्रधानमंत्री को पुलिस प्रमुखों की राष्ट्रीय बैठक में भीड़ द्वारा अंजाम दी गई इन वारदातों पर चिंता जतानी पड़ी।
ये घटनाएं देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में लोगों के विश्वास की कमी को दर्शाती हैं। आखिर क्या चीज है, जो लोगों को दूसरों को पीटने, खामोश कर देने और जान से मार डालने के लिए मजबूर कर देती है? अक्षम पुलिस, लचर अभियोजन, सुस्त न्यायपालिका और वे जेलें- जहां से डॉन किस्म के लोगों को सुरक्षित घेरे से अपनी गैर-कानूनी हरकतें जारी रखने की छूट मिल जाती है। यही वे वजहें हैं, जिनके चलते लोगों का कानून से विश्वास उठ गया है। न्यायिक सुधारों पर बनी मालीमथ समिति हमें बहुत पहले 2004 में ही यह चेतावनी दे चुकी है कि आपराधिक न्याय प्रणाली ‘लगभग ढह चुकी है’ कि यह ‘सुस्त, अक्षम और अप्रभावी’ है और इस कारण ‘व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है।’ समिति ने इसे सुधारने के लिए सिफारिशें की थीं, जो दुर्भाग्य से मानवाधिकारवादी कार्यकर्ताओं और नागिरिक स्वंत्रता के मसीहाओं के भेष में घूमने वाले निहित स्वार्थी तत्वों के विरोध के शोर के कारण रद्दी की टोकरी में डाल दी गईं, और बहुवांछित सुधारों को फिर अटका दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के कामकाज में व्यापक सुधारों के लिए 22 सितम्बर, 2006 को खास दिशा-निर्देश जारी किए थे। कई राज्यों ने इन्हें लागू भी कर दिया, लेकिन बड़े राज्यों ने इन्हें या तो लागू ही नहीं किया, या वे लागू करने का स्वांग करते रहे। गुजरात ने यह रूख अपना लिया कि इन्हें लागू करने से संविधान का संघीय चरित्र प्रभावित होगा। महाराष्ट्र ने तर्क दिया कि ये दिशा-निर्देश वैधानिक प्रावधानों के खिलाफ हैं, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में इनका प्रतीकात्मक अनुपालन कर दिया गया, जबकि बिहार में एक कानून पारित कर दिया गया, जो बेहद दकियानूसी था। दुर्भाग्यवश सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को लटकाने, बेदम करने और संभवत: उन्हें पटरी से उतारने की हरचंद कोशिश की गई।
सुधारों का प्रतिरोध हर तरफ से है। नेता और अफसरशाह यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर हैं, क्योंकि इससे आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न हिस्सों पर उनका दबदबा बढ़ता है। दूसरी आ॓र मनवाधिकारवादी जमात अपराधियों और आतंकवादियों के अधिकारों से ज्यादा कुछ सोच ही नहीं सकती। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि जिस परिवेश में समाज औपनिवेशिक युग के बने कानूनों पर निर्भर है और जहां सुधारों की प्रक्रिया को अदूरदर्शी अफसरशाही और दृष्टिहीन नेताओं ने लटका रखा है, वहां न्याय की अपेक्षा करने वाले लोग हताशापूर्ण उपायों का सहारा लेते हैं, नक्सलवादी जन अदालतें चलाते हैं, जहां कठोर लेकिन तुरंत फैसला कर दिया जाता है। वे तो आदमी की ऊंचाई नौ इंच कम करने (दूसरे शब्दों में सिर कलम कर देने) पर जश्न मनाते हैं। इसी तरह अन्य लोग, जो आपराधिक न्याय प्रणाली पर विश्वास खो चुके हैं, अपनी तरह का न्याय कर देते हैं।
भीड़ के न्याय को समाज में किसी ढांचागत त्रुटि को सुधारने या दूर करने के उद्देश्य से नैतिक तौर पर विरोधाभासी आचरण कहकर परिभाषित किया गया है। हम इन दिनों जिस तरह की भीड़ की हिंसा देख रहे हैं, वह हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में ढांचागत त्रुटियों के खिलाफ एक तरह का विरोध प्रदर्शन है। भीड़ के न्याय की हरकतें हर हाल में लोकतंत्र और कानून के शासन के लिए एक खतरा हैं।
ऐसा नहीं है कि बाकी देश इस तरह की घटनाओं से मुक्त हैं। अमेरिका में भीड़ के न्याय की प्रवृति अठारहवीं सदी में देखी गई थी। जिसमें उचित कानूनों के अभाव में कुछ स्वैच्छिक संगठन इकट्ठे होकर उन लोगों को पीटते, प्रताड़ित करते और जान से मार देते थे जिन्हें वे अपने समुदाय के लिए खतरा मानते थे। यह प्रवृति 1920 और 1970 के दशकों में दोबारा नजर आई, जिसे विशेषज्ञों ने नव चौकीदारीवाद कहा। 1920 के दशक में जब चीन में व्यापक अव्यवस्था थी, बिग स्वर्ड सोसाइटी लोगों की जान-माल की रक्षा करती थी। फिलीपींस में दावाओं डेथ स्क्वाड शहर के कथित खतरनाक अपराधियों का सफाया कर देता था। अल सल्वाडोर में पुलिस और सेना के रिटायर्ड अफसरों के एक समूह ने देश से ‘अपवित्र’ तत्वों की सफाई का बीड़ा उठा लिया।
यह सब बताने का उदे्देश्य चौकीदारीवाद को या लोगों द्वारा किसी भी तरह के त्वरित न्याय को उचित ठहराना नहीं है। यह एक जंगली न्याय था और है, जिसमें कोई ढांचागत प्रक्रिया नहीं होती, कोई तय कानून नहीं होते और जिसमें आरोपी को अपने बचाव का शायद ही कोई मौका मिलता है। किसी भी सभ्य समाज में ऐसे बर्बर न्याय के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। भारत जैसी उभरती हुई ताकत और लोकतंत्र में तो कतई नहीं। इस प्रवृति को तुरंत रोका जाना चाहिए अन्यथा यह अराजकता की हालत पैदा कर सकती है। पुलिस को अपना वैध कार्य अवश्य करना चाहिए और उसके लिए आवश्यक ढांचागत परिवर्तन किए जाने चाहिए। इसका दीर्घकालिक उपाय यही है कि आपराधिक न्याय प्रणाली को चुस्त किया जाए और कानून के शासन को चुस्ती से एक समय सीमा के भीतर और समुचित ढंग से लागू किया जाए।
इस व्यवस्था को लागू करने पर ढेर सारे अपराध अपने आप कम हो जाएंगे। भीड़ द्वारा किसी अपराधी को पीट-पीट कर मार डालना किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक की बात है। इसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। यदि इसी तरह से न्याय दिया जाएगा तो वह जंगल राज होगा, न कि सभ्य समाज। अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस के काम का बंटवारा होना चाहिए। कानून-व्यवस्था का अनुपालन कराने वाली पुलिस अलग हो और इंवेस्टीगेशन पुलिस अलग। मालीमथ समिति की रिपोर्ट इस दिशा में सराहनीय कार्य कर सकती है। उसे जल्द से जल्द लागू करना होगा।
