नन्दीग्राम में शांति जरूरी

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नंदीग्राम में भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के जुलूस पर गोलियां बरसाकर माकपा ने अपना क्रूञ्र चेहरा ही नहीं दिखाया है, बल्कि अब भीतरी आलोचना से वाममोर्चे में दरार भी पड़ गई है। करीब दस महीने बाद नंदीग्राम में फिर हुई हिंसा से साफ है कि माकपा नेतृत्व इस मसले को हल करने में विफल रहा है। यह शुरू से स्पष्ट है कि नंदीग्राम की लड़ाई दरअसल स्थानीय माकपा नेतृत्व की मूंछ की लड़ाई है। पिछली बार जब वहां खून-खराबा हुआ था, तो माकपा नेतृत्व ने जताया था कि परिस्थिति के आकलन में उससे चूक हुई है। सवाल यह है कि लगभग दस महीने बाद भी नंदीग्राम के हालात जस के तस क्‍यों हैं। शनिवार को निहत्थे लोगों पर गोलियां क्‍यों चलीं? इसके दो ही जवाब हो सकते हैं। या तो माकपा नेतृत्व ने इस मसले का हल निकालने की गंभीरता से कोशिश नहीं की। या वह खुद भी किसानों को निशाना बनाने की इस खूनी हिंसा में शरीक है। माकपा कार्यकर्ताओं की हिंसा के परिप्रेक्ष्य में पुलिस प्रशासन के चुपचाप बैठे रहने से भी इस आशंका को बल मिलता है। माकपा वह पार्टी है, जो दूसरे राजनीतिक दलों को न्याय, इंसाफ और पारदर्शिता का पाठ पढ़ाती रहती है। लेकिन नंदीग्राम में उसका रवैया देखिए। शनिवार की हिंसा में अनेक लोग मारे गए हैं। इसके ब्‍योरे हैं कि माकपा कार्यकर्ता लाशों को उठा-उठाकर कहीं और ले गए हैं, ताकि इनकी गिनती उनकी पोल न खोल दे। राज्यपाल ने नंदीग्राम को युद्धभूमि की संज्ञा दी है। लेकिन इस पर शर्मसार होने के बजाय माकपा राज्यपाल को सांविधानिक तौर-तरीके की सीख दे रही है! नंदीग्राम को गुजरात बताने वाली कोई और नहीं, माकपा की सहयोगी पार्टी आरएसपी है, जिसके एक मंत्री इस हत्याकांड के विरोध में इस्तीफा देने की बात कर रहे हैं। वाममोचां सरकार के तीन दशक के शासनकाल में कदाचित यह पहला मौका है, जब इसका एक सहयोगी सरकार से अलग होने की बात कर रहा है। ममता बनर्जी के अभियान और लोकसभा से इस्तीफे को विरोध की राजनीति का हिस्सा मान सकते हैं। लेकिन सैकड़ों बुद्धिजीवियों के अनशन पर बैठने और कोलकाता फिल्म महोत्सव पर इसकी काली छाया पडऩे के गंभीर निहितार्थ हैं। महाश्वेता देवी तो सिंगुर में हुई हिंसा के समय से ही वाममोर्चे का विरोध कर रही हैं। शनिवार को नंदीग्राम में दूसरी बार की हिंसा ने चिदानंद दासगुप्ता, अपर्णा सेन और रितुपर्णों घोष जैसे फिल्मकारों को भी सरकार के विरोध में ला खड़ा कर दिया है। माकपा कार्यकर्ताओं ने मेधा पाटकर के साथ जिस तरह बदसुलूकी की और ममता बनर्जी के काफिले को जगह-जगह रोककर जिस तरह परेशान किया, उससे भी देश भर में प्रतिकूल संदेश गया है। केंद्र भले ही यूपीए को एकजुट रखने के लिए माकपा के प्रति सख्‍त न हो रहा हो, लेकिन बुद्धदेव सरकार को संयम बरतने का निर्देश तो दिया ही जा सकता है। इसके अलावा पीडितों को न्याय दिलाने और दोषी कार्यकर्ताओं को दंडित करने के लिए भी राज्य सरकार पर दबाव बनाना होगा। राज्य सरकार विशेषकर माकपा को नन्दीग्राम की ओर विशेष ध्यान देना होगा, क्‍योंकि वहां की भयावह स्थिति की लपट राज्य के अन्य क्षेत्रों को अपने आगोश में ले सकती है। इसलिए सरकार को अविलम्‍ब नन्दीग्राम में बर्चस्व की लड़ाई को खत्म करनी चाहिए, ताकि वहां शांति की स्थापना हो सके। नन्दीग्राम में हो रही हिंसा को देखते हुए आज विपक्षी दलों द्वारा पश्चिम बंगाल बंद का आह्वान किया गया, जिसने सम्‍पूर्ण राज्य को अचल कर दिया । इससे केञ्वल सरकार को तो नुकसान हुआ ही है, आमलोगों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है।

Published in: on November 13, 2007 at 3:08 pm Leave a Comment

पाकिस्तान में एटमी माशर्ल लॉ

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पड़ोसी देश पाकिस्तान के सामने हालात इधर कुआं और उधर खाईं वाले हैं। इमर्जेंसी के नाम पर जनरल परवेज मुशर्रफ ने जो व्यवस्था वहां लागू कर दी है, उसे इमर्जेंसी कहना भी गलत है। संविधान शासित किसी भी देश में इमर्जेंसी या आपातकाल एक संविधान सम्मत व्यवस्था ही हुआ करती है, जिसमें जनता के अधिकार और राज्य के कर्त्तव्य से जुड़ी कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं किसी सच्चे या झूठे खतरे के नाम पर इस वायदे के साथ कुछ समय के लिए निलंबित कर दी जाती हैं, कि यह समय गुजर जाने के बाद इन्हें वापस बहाल कर दिया जाएगा। जनरल द्वारा लागू की गई मौजूदा व्यवस्था के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। उन्होंने 1973 में बने पाकिस्तान के संविधान को ही एक झटके में कूड़ेदान के हवाले कर दिया है और किसी निर्धारित व्यवस्था का हवाला देते हुए ऐसा कोई वायदा भी नहीं किया है कि कितने समय के बाद मौजूदा व्यवस्था को समाप्त करके वहां पुरानी या कोई नई संवैधानिक व्यवस्था लागू कर दी जाएगी। साढ़े सोलह करोड़ की आबादी वाले एक परमाणु शक्ति संपन्न देश में इस तरह की अर्ध-बर्बर शासन व्यवस्था का लागू होना उस देश के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए कितनी खतरनाक बात है, एकबारगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। यहां हाल ही में प्रकाशित एक अमेरिकी रणनीतिकार की किताब में उद्धृत एक तथ्य को ध्यान में रखें तो इस खतरे की एक झलक महसूस की जा सकती है। उक्त किताब में भरोसेमंद सूत्रों को आधार बनाते हुए बताया गया है कि करगिल युद्ध में अपनी पिटाई तय जानकर पाकिस्तानी फौज ने भारत के खिलाफ परमाणु बम इस्तेमाल करने का मन बना लिया था। गौरतलब है कि उस समय पाकिस्तान में नवाज शरीफ की हुकूमत थी और अमेरिकी दबाव से किसी तरह कगार पर खड़ा मामला काबू में आ गया। आज जब वहां हुकूमत के सारे तौर फौजियों के ही हाथ में हैं तो कब क्या हो जाएगा, कौन जानता है। विडंबना यह है कि इसका दूसरा पहलू और भी ज्यादा खतरनाक है। पाकिस्तान के उत्तरी और पश्चिमी कबीलाई इलाकों में एक अर्से से डेरा जमाए इस्लामी आतंकवादी तत्व लाल मस्जिद की घटना के बाद से राजधानी इस्लामाबाद और आर्थिक राजधानी कराची समेत पूरे पाकिस्तान में अपनी धमक जमा चुके हैं। समाज की तरफ से इकलौता विरोध उन्हें अभी तक देश के पढ़े-लिखे शहराती मध्यवर्ग की तरफ से झेलना पड़ रहा था, लेकिन मुशर्रफ के अघोषित मार्शल लॉ से उसके एक हिस्से की सहानुभूति भी इस शासन के खिलाफ लड़ रही जेहादी ताकतों के साथ हो सकती है। इन बारूदी हालात में जेहादी सोच वाले पाकिस्तानी फौज के किसी हिस्से ने अगर कभी मुशर्रफ का तख्ता पलटने का फैसला कर लिया तो यह आतंकवाद से जुड़े दुनिया के सबसे भयावह दु:स्वप्नों के सच होने जैसा होगा। पाकिस्तानी जनता से ज्यादा यह विश्व राजनय की परीक्षा है।