शारीरिक सुख…पैसे की चकाचौंध या फिर आधुनिकता?

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आधुनिकता की चकाचौंध ने सबको अपनी तरफ आकर्षिक किया है। समाज के हर तबके की मानसिकता बदल गई है। लोगों की मानसिकता का बदलाव समाज से तालमेल स्थापित नहीं कर पा रहा है। आज लोगों की महत्वाकांक्षा बढ़ गई है और वह उसे हर हाल में पूरा करना चाहते हैं। कुछ समय पहले तक किसी भी अपराध या दुराचार को व्यक्तिगत मामला कहकर टाला नहीं जा सकता था लेकिन आज हर किसी ने अपने को सामाजिक जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया है। रही-सही कसर संयुक्त परिवारों के टूटने से पूरी हो गई। व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो गया है।समाज और परिवार दो महत्वपूर्ण इकाई थे जो व्यक्ति के लिए सपोर्ट सिस्टम का काम करते थे। व्यक्ति सिर्फ अपने बीबी-बच्चों के प्रति ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के प्रति जिम्मेदार होता था। पास-पड़ोस से मतलब होता था, आज वह पूरी तरह खत्म हो गया है। आज हमारे पड़ोस में कौन रहता है, इसकी खबर न तो हमको रहती है और न करना चाहते हंै। आज यदि आप अपने पड़ोसी से संबंध बनाना भी चाहें तो शायद वह ही संबंध बनाने का इच्छुक न हो। पड़ोस का डर और सम्मान अब नहीं रहा। अपनी जड़ों, समाज और संस्कृति से हम कट गए हंै। पुराने मूल्यों का टूटना लगातार जारी है।आधुनिकतम जीवनशैली अभी तक कोई मूल्य स्थापित नहीं कर पाई है, जिसकी मान्यता और बाध्यता समाज पर हो। आज समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। कोई मूल्य न रहने से नैतिक बंधन समाप्त हो चुका है। यह स्वच्छंदता ही गलत राह पर ले जाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है। आज हर आदमी उच्च वर्ग की नकल कर रहा है, इसके लिए चाहे जो रास्ता अपनाना पड़े। मेरे पास भी वह कार होनी चाहिए जो पड़ोसी के पास है। दफ्तर में सब के बराबर भले ही वेतन न हो, लेकिन हम किसी से कम नहीं।एक समय था जब समाज के निचले तबके अथवा छल कपट से कोठे पर पहुंचा दी गई महिलाएं ही इस पेशे में थीं, अब तो समाज के हर वर्ग के लोग इसमें शामिल हैं। खास कर पढ़ी-लिखी उच्च और मध्यम घराने की लड़कियां तो ज्यादा हैं। अभी दिल्ली के स्कूल की अध्यापिका ने जो किया वह तो मानवता के लिए कलंक के समान है। संकुचित मानसिकता, परिवारों का विघटन और अल्प लाभ के लिए यह पेशा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे विकृति कहा जाता है। पहले हम वही सामान खरीदते थे जिसकी जरूरत होती थी। कुछ लोगों में मालसिंड्रोम होता है। वे दुकानों में घुसने पर सब कुछ खरीद लेना चाहते हंै। घर-परिवार से तो हर आदमी को एक निश्चित राशि ही मिलती है। इसके लिए उन्हें गलत रास्ता अख्तियार करना पड़ता है। छात्रवासों में रहने वाली लड़कियां हमारे पास आती हंै। उनको अपने इस काम से कोई अपराधबोध नहीं होता है। कुछ तो पैसे के लिए फार्म हाउस में जाती हंै। फार्म हाउस और कोठियां सबसे सुरक्षित स्थान बन गए हैं। ऐसे स्थानों पर जाने वाली लड़कियां एक रात में ही हजारों कमा लेती हैं। इसका कारण पूछने पर पता चलता है कि अपनी असीमित इच्छाओं की पूर्ति के लिए आज बड़े घरों की लड़कियां भी इस पेशे में उतर आई हैं। विदेशों में तो डॉक्टर और इंजीनियर की सम्मानित नौकरी पर लात मार कर ढेर सारी महिलाएं इसमें आई हैं। कम समय में ज्यादा पैसा कमाना ही इसका मुख्य कारण है।

सेक्स की कुंठा से भी कुछ महिलाएं इस पेशे में आती हंै। इस बीमारी को निम्फोमेनिया कहते हैं। ऐसी महिलाएं पैसा तो नहीं लेती हैं, लेकिन यह भी अनैतिक ही है। सेक्स कारोबार में इनका प्रतिशत सिर्फ आठ है। आज का सारा सेक्स रैकेट पढ़े-लिखे सफेदपोश लोग संचालित कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण धैर्य की कमी, तात्कालिक लाभ, मानसिक असंतुलन और अमीर बनने की चाहत है।सेक्स रैकेट आज प्रोन्नति, ठेके, पैसे और बड़े-बड़े कामों में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुका है। शारीरिक सुख और पैसा सबसे ऊपर हो गए हैं। आज जिसके पास पैसा नहीं है उसके पास लोगों की निगाह में कुछ भी नहीं है। पैसे में ही मान-सम्मान, इज्जत और सारा सुख निहित मान लिया गया है। एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि शहरों की आबादी जिस तरह से बढ़ रही है उसमें देश के एक छोर से दूसरे छोर के लोग आसपास रहते हुए भी एक दूसरे से घुल मिल नहीं पाते हैं। यही कारण है कि गांवों की अपेक्षा शहरों में सेक्स रैकेट ज्यादा है।

Published in: on November 19, 2007 at 7:39 am Leave a Comment

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