केंद्र सरकार इमोरल ट्रैफिकिंग पर रोक लगाने के लिए 1956 में बने कानून में संशोधन करने जा रही है। सरकार जहां इस संशोधन को सेक्स वर्करों की समस्याओं को कम करने की दिशा में अहम बता रही है वहीं देश भर के सेक्स वर्कर सरकार के कदम का खुल कर विरोध कर रहे हैं। इस कानून में बदलाव के लिए एक संसदीय समिति ने संसद में 23 नवंबर, 2006 को संशोधन प्रस्ताव रखा। समिति ने कानून में संशोधन संबंधी सुझाव भी दिए। अब महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने भी इसमें कुछ संशोधन कर सरकार को अंतिम मुहर लगाने के लिए भेजा है। हालांकि जिनके लिए यह कानून बनाया जा रहा है उनको सरकार विश्वास में नहीं ले पाई है।
महिला बाल कल्याण मंत्रालय मौजूदा कानून की धारा 2 (एफ) के तहत परिभाषित वेश्यावृति की नई व्याख्या करना चाहता है। वह धारा 2 (जे)और 2 (के) में व्यावसायिक यौन शोषण और शोषण के शिकार की व्याख्या को शामिल करना चाहता है। देश भर के सेक्स वर्करों का विरोध इसी संशोधन को लेकर है। महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने वेश्यावृति की जो नई परिभाषा दी है, उसके मुताबिक पैसे या किसी अन्य कारण से सेक्स को अपराध माना जाएगा। सरकार अगर इन संशोधनों को मान लेती है तो ट्रैफिकिंग और वेश्यावृत्ति एक ही कानून के दायरे में आएंगे। वेश्यावृत्ति फिलहाल देश में अपराध नहीं है लेकिन कानून में संशोधन के बाद वह अपराध के दायरे में होगी। इससे देश की लाखों सेक्स वर्करों की मुश्किलों का अंदाजा लगाया जा सकता है। अपने देश में ऐसी सेक्स वर्करों की संख्या बहुत ज्यादा है जो गरीबी और भुखमरी से बचने के लिए जिस्म का सौदा करने पर मजबूर हैं। महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने इस संबंध में संसदीय समिति के सुझावों को भी नहीं माना है।
नवंबर, 2006 में जब संसदीय समिति ने कानून में संशोधन के प्रस्ताव दिए थे, तब भी सेक्स वर्करों ने संशोधन प्रस्तावों का विरोध किया था। उस प्रस्ताव में एक प्रस्ताव यह भी था कि जो कोई भी वेश्यालय या रेडलाइट इलाके में धरा जाता है उस पर आपराधिक कार्यों में संलिप्तता के तहत कार्रवाई की जाएगी। इस पर काफी हाय तौबा मचने के बाद महिला बाल कल्याण मंत्रालय ने इसे बदला है, मगर बदलाव कोई राहत देने वाला नहीं है। अब जो प्रस्ताव है उसके मुताबिक वेश्यालय या फिर रेड लाइट इलाके में आने वाले ग्राहकों पर आपराधिक मामले बनेंगे। जाहिर है जब ये कानून का रूप लेगा तो बदनामी और मुकदमे से बचने के लिए सेक्स वर्करों के पास ग्राहकों का जाना कम होगा। कोलकाता के सोनागाछी के सेक्स वर्करों की संस्था दरबार महिला समन्वय समिति की अध्यक्ष भारती डे का कहना है, ‘अगर हमारे ग्राहकों को पकड़ा जाएगा तो वो हमारे पास नहीं आएंगे। क्या ये हमारे पेट पर लात मारने जैसा नहीं है?।’दरअसल देश के विभिन्न राज्यों के सेक्स वर्करों की 14 संस्थाएं पिछले एक साल से लगातार महिला बाल कल्याण मंत्रालय से कानून में तर्कसंगत बदलाव की मांग कर रही है, लेकिन अब इन संगठनों को लगता है कि इनके साथ धोखा हुआ है। नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर के डॉ एस जेना सरकार से ट्रैफिकिंग पर रोक लगाने की बात करते हैं लेकिन कहते हैं कि सरकार को समझना चाहिए कि यह लाखों महिलाओं की आजीविका का साधन है। जेना के मुताबिक सेक्स वर्करों के लिए लेबर एक्ट संबंधित कानून बनाया जाना चाहिए ना कि क्रिमनल कानून। जेना बताते हैं कि सेक्स वर्कर खुद इमोरल ट्रिैफकिंग रोकने के लिए काम कर रही हैं। जरूरत है तो सिर्फ उनके भरोसे को मजबूत करने की। जेना कोलकाता के जाधवपुर विश्वविघालय के उस रिसर्च अध्ययन का हवाला देते हैं जिसमें ये उभरा है कि कोलकाता और उसके आसपास सेक्स वर्करों के संगठन दरबार महिला समन्वय समिति ने कई नबालिग बच्चे और बच्चियों को इस दलदल से बाहर निकाला है। कर्नाटक के मैसूर में सेक्स वर्करों के लिए काम कर रहे संगठन आशुद्ध समिति के सलाहकार सुशेना रजा पाल कहती हैं, ‘हाल के सालों में इमोरल ट्रैफिकिंग बहुत बढ़ी है और इसकी मार भी सेक्स वर्करों को झेलनी पड़ रही है, ऐसे में हम सरकार की मदद करने के लिए तैयार हैं। अगर सरकार हमारी मांगों पर ध्यान दे तो हम अपने अपने इलाके में नाबालिगों की इमोरल ट्रैफिंिकंग रोकने के हरसंभव उपाय करेंगे।’इसके अलावा संशोधन में एक प्रस्ताव ये भी है कि पुलिस इंस्पेक्टर के नीचे भी सब इंस्पेक्टर रैंक के पुलिसकर्मी को विशेष अधिकार दिए जाएं ताकि इमोरल ट्रैफिकिंग को कम किया जा सके। इस प्रस्ताव को लेकर भी सेक्स वर्करों में चिंता है। ज्यादातर सेक्स वर्करों का मानना है कि इमोरल ट्रैफिकिंग के ज्यादातर मामलों में स्थानीय पुलिस और माफिया तत्वों की मिलीभगत होती है, लेकिन पुलिस प्रताड़ित सेक्स वर्करों को करती है। सरकार के संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में भाग लेने आंध्र प्रदेश से दिल्ली आई सेक्स वर्कर सत्यवती का कहना है कि कानून बनने के बाद पुलिस को ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे। उनकी वसूली बढ़ेगी तो लालच में वो हमें बार-बार तंग करने पहुंचेंगे। पता नहीं सरकार इस कानून के जरिए किस मदद की बात कर रही है।
इसके अलावा सेक्स बाजार और रेडलाइट इलाकों के समाजिक आर्थिक तानबाने पर नजर रखने वालों का मानना है कि कानून में संशोधन से एचआईवी एडस के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों को धक्का पहुंचेगा। बजाहिर है कि मौजूदा प्रस्तावों के कानून बनते ही सेक्स वर्कर चोरी छुपे धंधा करेंगी। ऐसे में उन तक एड्स रोकथाम संबंधी जानकारी और जागरूकता पहुंचाना संभव नहीं होगा। इस संकट को भांपते हुए भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मौजूदा प्रस्तावों से अपनी असहमति जताई है। नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन ने अपनी आपत्ति जताई है।हालांकि अब यह सरकार को तय करना है कि वह मौजूदा प्रस्ताव को कानून का रूप दे दे या फिर से संशोधन के लिए महिला बाल कल्याण मंत्रालय को लौटा दे। हालांकि यह जरूरी है कि सरकार सेक्स वर्करों की मांगों को भी सुने। नहीं तो मुंबई बार-बालाओं का उदाहरण सामने है। महाराष्ट्र सरकार ने बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के डांस बारों को बंद कर दिया। आए दिन बार-बालाओं की गिरफ्तारी से पता चलता है कि यह चोरी-छुपे अब भी जारी है वहीं आकलन यह भी बताता है कि इस रोक के बाद हजारों बार-बालाएं पेट पालने के लिए जिस्मफरोशी के धंधे में उतर पड़ीं। बेहतर तो यही होता कि सरकार किसी कड़े कानून लाने के बदले इन लोगों के लिए रोजगार के अन्य विकल्पों पर विचार करती, हालांकि हर किसी को रोजगार देना व्यावहारिक रूप से असंभव ही है। ऐसे में सरकार को चाहिए को वो सेक्स वर्करों के संगठनों के सुझावों पर भी ध्यान दे। सेक्स वर्करों की सबसे बड़ी मांग ये है कि ट्रैफिकिंग और वेश्यावृत्ति दोनों अलग-अलग हैं और इसके लिए एक समान कानून नहीं होना चाहिए । सेक्स वर्करों का कहना है कि ट्रैफिकिंग के पीछे प्राय: एक गिरोह काम कर रहा होता है जबकि वेश्यावृत्ति आजीविका के चलते महिलाओं के लिए मजबूरी भी है। पिछले सप्ताह दिल्ली में देश भर के सेक्स वर्करों के प्रतिनिधियों ने इक्ट्ठा हो कर इस प्रस्ताव का विरोध किया है। इन प्रतिनिधियों का मानना है कि उनकी रोजी रोटी का सवाल है वो हर संभव संघर्ष जारी रखेंगी।
