आतंकवाद और पाकिस्तान

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9/11 के बाद से दुनिया भर के रणनीति विशेषज्ञों के बीच पाकिस्तान की चर्चा आतंकवाद की नई धुरी के रूप में होने लगी है। बीच-बीच में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ऐसी ब्योरेवार खबरें प्रकाशित हो रही हैं कि कैसे पाकिस्तान में आतंकवादियों को अपनी गतिविधियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना हासिल हो रहा है। अमेरिका भी अपने आतंकवाद विरोधी युद्ध के हिस्से के रूप में अंतरराष्ट्रीय सीमाएं पार कर पाकिस्तान के भीतर आतंकवादियों पर सीधी चढ़ाई करने के बारे में सोच रहा है। इस उभरती हुई नई परिस्थिति में जिस पहले सवाल का जवाब खोजने की जरूरत है, वह यह है कि पाकिस्तान आखिर कैसे एक आतंकवाद प्रायोजक राज्य में बदल गया?
इस सवाल का जवाब ढ़ंढते हुए संक्षेप में पाकिस्तान के इतिहास का जायजा लेना जरूरी है। स्वतंत्र होने के कुछ ही महीनों के भीतर पाकिस्तानी फौज इस नतीजे पर पहुंच गई कि अनियमित युद्ध को उसे राज्य कौशल का एक अंग मानकर चलना होगा। इस नीति की पहली झलक अक्टूबर 1947 में भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य में पाकिस्तानी घुसपैठ के रूप में देखने को मिल गई। पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक यह घुसपैठ लश्करों द्वारा की गई। यह एक अलग ही कहानी है कि लश्करों को जरिया बनाकर संपा की गई इस गतिविधि का कोई फायदा उस समय पाकिस्तान को नहीं मिला।
बहरहाल, अगले तीस वषा में पाकिस्तान ने यह विकल्प खुला रखा। अफगानिस्तान में सोवियत दखल के बाद 1981 में इस अवधारणा को पुनर्जीवित करने का पहला अवसर उपलब्ध हुआ।
शीतयुद्ध की राजनीति के तहत अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप के लिए उसे सबक सिखाने का फैसला किया। अफगानिस्तान में चले इस अघोषित युद्ध में कई देशों ने हिस्सा लिया। पाकिस्तान में मौजूद अफगान शरणार्थी रातोंरात मुजाहिदीन बन गए। अमेरिका के सबसे तेज-तर्रार दिमागों ने इन मुजाहिदीनों की दीक्षा के लिए विचारधारात्मक पृष्ठभूमि तैयार की। सऊदियों ने इन मुजाहिदीनों को छापामार युद्ध में प्रशिक्षित करने के लिए भरपूर वित्ताीय सहायता प्रदान की। पाकिस्तान ने स्वेच्छा से खुद को सोवियत संघ के विरूद्ध अमेरिकी नेतृत्व में चलने वाले इस युद्ध के लिए खुद को अग्रिम मोर्चे के देश के रूप में प्रस्तुत किया। अमेरिका और सऊदी अरब द्वारा समूची इस्लामी दुनिया में अपील जारी की गई कि बतौर खुदाई खिदमतगार लोग मुजाहिदीन कतारों में शामिल हों। इस अपील के असर में मुजाहिदीन के साथ आ जुड़ने वालों में एक नाम आ॓सामा बिन लादेन का भी था।
एक आकलन के अनुसार सोवियत संघ के विरूद्ध पूरे आठ साल चले इस युद्ध में 120 देशों ने हिस्सेदारी की और पाकिस्तानी फौज के जरिए मुजाहिदीनों को एक लाख टन हथियार और गोला-बारूद की आर्पूित की गई। इस प्रक्रिया में पाकिस्तानी सैन्य बलों और गुप्तचर संस्थाओं की मुजाहिदीनों के साथ बनती एकता को भी रेखांकित किया गया। 1988 में अफगानिस्तान से सोवियत वापसी के बाद करपंथी इस्लामी विचारधारा अपना चुके कुछ मुजाहिदीन गुटों ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि वे एक महाशक्ति (सोवियत संघ) को परास्त कर चुके हैं और अपनी विचारधारात्मक प्रेरणा से वे संसार की किसी भी ताकत को हरा सकते हैं।
दरअसल, पाकिस्तानी सत्ताा प्रतिष्ठान में बैठे बहुत सारे लोग भी यह मानने लगे थे कि इन करपंथी इस्लामी गुटों के जरिए वे अपने बहुतेरे सैन्य उद्देश्यों की र्पूित कर सकते हैं। यहां तक कि बेनजीर भुो और नवाज शरीफ जैसे निर्वाचित प्रधानमंत्रियों का नजरिया भी कुछ ऐसा ही हो चला था। बेनजीर की कैबिनेट में शामिल गृहमंत्री लेफ्टिनेंट जनरल नसरूल्ला बब्बर ने आईएसआई और डीएमआई के साथ मिलकर 1990 के दशक के प्रारंभ में तालिबान की वैचारिक रूपरेखा तैयार की और मुल्ला उमर को इसका मुखिया चुना। अगले एक दशक की अवधि में पाकिस्तान-अफगानिस्तान संसार भर में करपंथी इस्लामी गुटों की प्रजनन भूमि के रूप में स्थापित हो गए। एक आकलन के मुताबिक पाकिस्तान में तब 60 हजार मदरसे काम कर रहे थे और हर मदरसे में कम से कम 200 छात्र पवित्र ग्रंथ का अध्ययन कर रहे थे। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब एक करोड़ लोग इन मदरसों में पढ़ रहे थे। उनका दस प्रतिशत भी जेहादी गुटों से जुड़ा हो तो यह संख्या दस लाख ठहरती है।
इन सभी गतिविधियों का वित्तापोषण नशीले पदाथा के व्यापार, अमीर अरब देशों द्वारा पूरी फराखदिली से मुहैया कराई जा रही मदद और दानदाता संगठनों के जरिए हो रहा था। शुरू में सोवियत संघ के विरूद्ध जारी लड़ाई के दौरान अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा बहुतायत में उपलब्ध कराए गए हथियार जेहादियों के बड़े काम आए। बाद के सालों में सोवियत संघ के विघटन से भी जेहादियों को हथियार खरीदने का एक बड़ा स्रोत हासिल हो गया।
1990 के दशक में विभिा जेहादी संगठनों के बीच चली बहसों से यह विचार उभरता दिखाई पड़ा कि अमेरिका मुख्य शैतान है और वह इस्लामी दुनिया की संपदा का शोषण कर रहा है। फरवरी 1998 में आ॓सामा बिन लादेन द्वारा अमेरिका और इजराइल के विरूद्ध युद्ध के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना की गई, जिसके तुरंत बाद दुनिया भर में मौजूद अमेरिकी परिसंपत्तिायों पर हमलों की एक पूरी श्रृंखला देखने को मिली। इसकी परिणति 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और वाशिगटन डीसी स्थित पेंटागन पर हुए हमलों में हुई।
करपंथी इस्लामी गुटों द्वारा किए गए इस हमले की प्रतिक्रिया में अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जिस युद्ध की शुरूआत की, उसके अभी तक सीमित नतीजे ही हासिल हो सके हैं। अक्टूबर 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले मेें वहां काम कर रहे करपंथी इस्लामी गुटों के कई अड्डे और उनका जमीनी ढांचा नष्ट हो गया। अमेरिकी युद्ध ने पाकिस्तानी सैन्य बलों को अपने काफी नजदीकी तालिबान और अल-कायदा जैसे संगठनों पर से अपनी छत्रछाया हटाने को मजबूर कर दिया। एक पर्यवेक्षक के अनुसार पाकिस्तानी फौज में तालिबान/अल-कायदा के समर्थन को लेकर ऊपर से नीचे तक दो-फाड़ हो जाने की नौबत आ गई है। माना जा रहा है कि पाकिस्तानी सैन्य बलों में 40 प्रतिशत से ज्यादा लोग तालिबान और अल-कायदा की कर इस्लामी विचारधारा में यकीन रखते हैं। पाकिस्तानी मीडिया में इस आशय की रिपोट अक्सर छप रही हैं कि निचले स्तर के खुफिया कर्मी सैन्य बलों द्वारा संभावित हमलों की अग्रिम सूचना तालिबान और अल-कायदा के कार्यकर्ताओं तक जल्द से जल्द पहुंचा देते हैं।
हाल के वषा में, खासकर सन् 2007 की शुरूआत से ऐसी कई रिपोट आई हैं, जिनमें बताया गया है कि किस तरह तालिबान और अल-कायदा ने क्वेटा (बलूचिस्तान), पेशावर (उत्तार-पश्चिमी सीमाप्रांत) और वजीरिस्तान जैसे संघ प्रशासित कबाइली क्षेत्रों में अपने लिए आरामदेह इलाके कायम कर लिए हैं।
न्यूजवीक में हाल ही में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक आज की दुनिया में पाकिस्तान सबसे खतरनाक जगह है। न्यूजवीक का कहना है, ‘अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों के बरक्स पाकिस्तान के पास ऐसी हर चीज है, जिसकी इच्छा अल-कायदा प्रमुख आ॓सामा बिन लादेन को हो सकती है: राजनीतिक अस्थिरता, इस्लामी चरमपंथियों का एक भरोसेमंद ढांचा, पश्चिम-विरोधी क्रुद्ध रंगरूटों की बहुतायत, एकांत में स्थित प्रशिक्षण क्षेत्र और ऐसे सुरक्षा सेवाएं, जो हमेशा वह नहीं करतीं, जो करने की उम्मीद उनसे की जाती है।’
इसके अलावा पाकिस्तान की नाभिकीय महत्वाकांक्षाओं की भी कोई सीमा नहीं है। पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम के जन्मदाता ए. क्यू. खान ने समूची इस्लामी दुनिया में नाभिकीय हथियार बनाने का बाकायदा एक गुप्त ढांचा तैयार कर दिया था, ताकि शैतानी ताकतों के खिलाफ इस दायरे में ज्यादा से ज्यादा नाभिकीय शक्तियों को खड़ा किया जा सके। यह ढांचा अपनी शुरूआत में ही पकड़ में आ गया, लेकिन नाभिकीय अस्त्र विस्तार के मामले में तबतक काफी नुकसान हो चुका था। पाकिस्तान आज जितनी अस्थिर परिस्थिति से गुजर रहा है, आतंकवाद यहां के माहौल में जितने भयंकर रूपों में अभिव्यक्ति पा रहा है, उसे देखते हुए इसके नाभिकीय आतंकवाद का केंद्र बन जाने की पूरी संभावना है। अंतरराष्ट्रीय रणनीति विशेषज्ञों के मुताबिक इससे बुरा परिश्य और कोई हो नहीं सकता।
यहां भारत में साउथ ब्लॉक में बैठे अधिकारियों को पाकिस्तान में हो रहे इन विकासों पर कड़ी नजर रखनी होगी, ताकि नाभिकीय आतंकवाद के मुकाबले के लिए वे अभी से कुछ जरूरी नीतियां सूत्रबद्ध कर सकें।

Published in:  on November 11, 2007 at 9:14 am Comments (1)