कहां गये नेताजी?

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इसे बेफिक्री कहें या बड़े लोगों की व्यस्तता कि पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से लेकर संसदीय राज्यमंत्री बी के हांडिक, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नवजोत सिंह सिद्धू, राज बब्बर, जया प्रदा जैसे कई नामी गिरामी सांसदों के पास गांव के लिए समय की कमी है। हाल यह है कि इन जैसे कई सांसदों ने विगत वर्ष में अपने अपने क्षेत्र में ग्रामीण विकास की समीक्षा के लिए गठित जिला निगरानी समिति की एक भी बैठक नहीं की है। जबकि कानूनन उन्हें वर्ष में चार बैठकें करने की जिम्मेदारी दी गई है और यह भी साफ कर दिया गया है कि बैठकें न करने पर उस क्षेत्र में योजनाओं के लिए केंद्रीय फंड रोका जा सकता है।
संसद में आम तौर पर सदस्यों की ओर से योजनाओं के क्रियान्वयन में जन प्रतिनिधि की भागीदारी बढ़ाने की मांग भले ही की जाती रही हो, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि वस्तुत: उनकी रुचि कम ही है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने सांसदों को जिला निगरानी समिति की कमान दी लेकिन उसका प्रदर्शन निराशाजनक है। दरअसल, संबंधित सांसदों की अध्यक्षता में यह बैठक हर तीन माह पर किए जाने का निर्देश है। इस नाते 2006-07 में कुल 595 जिलों में लगभग 2400 बैठकें की जानी थीं, लेकिन सिर्फ 753 बैठकें हो सकी हैं। अधिकतर सांसदों ने महज एक-दो बैठकें कर औपचारिकता निभा दी हैं।
जबकि लगभग सौ सांसदों ने पिछले वर्ष एक भी बैठक नहीं की है। आंकड़े बताते हैं कि आडवाणी के क्षेत्र गांधीनगर में कोई बैठक नहीं हुई है। हालांकि आंकड़ों में केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद के क्षेत्र छपरा (सारण) में भी बैठक की कोई जानकारी नहीं है, लेकिन उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने संभवत: 2007 के फरवरी में एक बैठक ली थी। जल संसाधन राज्य मंत्री व राजद सांसद जयप्रकाश नारायण यादव ने भी जमुई जिले में कोई समीक्षा बैठक नहीं की। अहमदाबाद से आने वाले भाजपा के तेज तर्रार नेता हरिन पाठक और शब्दों के जाल फैलाने वाले अमृतसर के सांसद नवजोत सिंह सिद्धू ने भी कभी बैठक की सुध नहीं ली। कांग्रेस के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, रामपुर से आने वाली सपा सांसद व पूर्व सिने तारिका जयाप्रदा, अपने भाषणों में उग्र व संवेदनशील दिखने वाले राज बब्बर, झारखंड से आनेवाले राजद के धीरेंद्र अग्रवाल, अकाली दल के सुखबीर सिंह बादल जैसे कई नेताओं के पास जिला निगरानी समिति के लिए समय का अभाव रहा।
सबसे बुरी स्थिति जम्मू-कश्मीर की है। यहां 14 में से 12 जिलों में कोई बैठक नहीं हुई। सबसे अच्छा प्रदर्शन पश्चिम बंगाल का है। यहां प्रारंभिक विरोध के बावजदू सांसदों ने एक बैठक ले ली है। सूत्रों का कहना है कि अब केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री डा. रघुवंश प्रसाद सिंह ने इन सभी नेताओं को पत्र लिखकर चौकन्ना करने का मन बनाया है। इसके साथ ही आगामी संसदीय सत्र के दौरान लगभग एक सप्ताह तक सभी सांसदों के साथ बैठक भी की जाएगी।

Published in:  on December 10, 2007 at 9:07 am Leave a Comment

पैसा और ग्लैमर के पेज थ्री

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एक समय पाठकों के बीच बहुत कम लोकप्रियता वाली ब्रिटिश पत्रिका ‘द सन’ के संपादक लैरी लैम्ब ने जब युवती स्टीफनी रान की टॉपलेस तस्वीर पेज तीन पर छापने का निर्णय लिया होगा तो उनकी मंशा अपने बॉस रूपर्ट मर्डोक को मुश्किल में डालना नहीं बल्कि पत्रिका को लोकप्रियता दिलाना और उसका प्रसार बढ़ाना था। दरअसल यह शुरूआत थी उस दुनिया की, जिसे आज सेलिब्रिटीज की दुनिया कहते हैं और इस दुनिया के भीतर झांकने की ललक आम लोगों में बढ़ती जा रही है।
समाज में खास और महान लोगों के समानांतर यह नई कतार उन लोगों की है, जिन्हें सेलिब्रिटीज कहते हैं और यही उन्हें कहलाना भी पसंद है। दिलचस्प है कि भारत जैसे देश में, जहां बाजार की धमक बाकी दुनिया के मुकाबले थोड़ी बाद में महसूस की गई वहां आज इस समानांतर कतार में एक तरफ राखी सावंत खड़ी हैं तो दूसरे छोर पर डॉ नरेश त्रेहन जैसे नामी सर्जन। ये वो लोग हैं जिन्हें लत लग चुकी है चर्चा में रहने की और जिन्हें भय लगता है अपने जैसों की दुनिया से बाहर निकलने में। यही कारण है कि उन्होंने अपनी रोजमर्रा की जिदगी के बीच से कई ऐसे मौके निकालने सीख लिए हैं जब वे साथ मिल बैठ सकें, गपशप कर सकें और अपनी खुशी और तसल्ली के लिए पीने-पिलाने तक की हसरत पूरी कर सकें। यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं है कि मिल-जुलकर ऐसे मौके, जिन्हें पेज थ्री पार्टी के तौर पर ज्यादा जानते हैं, वहां सिर्फ ग्लैमर और चकाचौंध की दुनिया से सरोकार रखने वाले लोग ही पहुंचते हैं। मुजफ्फर अली, प्रसून जोशी, प्रह्लाद कक्कड़, शोभा डे, जावेद अख्तर जैसे ‘क्रिएटिव’ कहे जाने वाले लोग भी आज बेतकल्लुफी से इन पार्टियों में अपने मन की कहते और करते देखे जाते हैं। दरअसल महानगरों में मेल-जोल के मौके बिल्कुल खत्म हो गए हैं और यही कारण है कि अलग हटकर करने वाले लोग इन पार्टियों में आते-जाते हैं।
इन पार्टियों में अपनी लक-दक दिखाने के लिए भी कई लोग जाते हैं या वैसे लोग, जिनकी आदत में यह शामिल हो गया है। पेज थ्री पर छपी इन पार्टियों की झलक देख लोगों के मन में लालसा जगती होगी कि आखिर इन पार्टियों में होता क्या है। टीवी एंकर एवं शो होस्ट गीतिका गंजू कहती हैं, ‘पार्टी र्सिकल के पुराने लोग मानसिक रूप से संभले हुए हैं जबकि नये लोगों का व्यवहार मूर्खतापूर्ण है। इनमें गहराई नहीं है, ये ज्यादा पीते हैं। कम उम्र के लोग हैं, खुद को बड़ा समझते हैं। इनमें गर्मजोशी नहीं होती। ये संवेदनशील भी नहीं होते।’ गीतिका के कथन से पैसे वालों की जबरदस्ती रखी गई पार्टियों की मानसिकता का खुलासा होता है। ये पार्टियां भी अलग-अलग किस्म की होती हैं। कुछ में केवल फैशन र्सिकल के लोग ही जाम उठाते नजर आते हैं। दिल्ली में होने वाली पार्टियों में मिस इंडिया रह चुकीं मॉडल नेहा कपूर, फैशन डिजाइनर रोहित बल, शिवानी वजीर पसरिच, मेकअप आर्टिस्ट अंबिका पिल्लई कुछ ऐसे नाम हैं जो आए दिन अखबार के पेजों पर दिख जाते हैं। फैशन प्रीव्यू के नाम पर भी ऐसी पार्टियों का आयोजन जमकर किया जाता है। एक ऐसी ही पार्टी में नेहा कपूर मीडिया का ध्यान अपनी आ॓र आर्किषत करने के लिए टेबल पर चढ़ गईं और लगी बोलने- मैं उड़ रही हूं, मैं मजे कर रही हूं।’ जाहिर है, लोगों का ध्यान उनकी आ॓र गया। इस तरह की चोंचलेबाजी इन पार्टियों में खूब होती है।
अखबार के पेजों पर दूसरी तरह की खास पेज थ्री पार्टियों की भी रपट छपती है, जिनमें शामिल होता है वह वर्ग जिससे हम प्रभावित रहते हैं। इस तरह की पार्टियां पुस्तक विमोचन, संगीत पुरस्कार आदि के उपलक्ष्य में आयोजित की जाती हैं। सुषमा सेठ, अमजद अली खां और शोभा डे सरीखे लोग इसका हिस्सा बनते हैं। दिल्ली में काफी समय से रह रहे जाने-माने साहित्यकार विष्णु प्रभाकर कहते हैं कि पहले हमारा जमावड़ा कॉफी हाउस में लगता था पर अब उसकी जगह ले रही है यह पार्टी संस्कृति। अब कमी भी हो गई है कॉफी हाउस की, अधिकतर तो बंद ही हो गए हैं। ऐसे में ये र्पािटयां ही नए समय के क्रिएटिव लोगों के मेल-जोल की जगह ले रही हैं। अब तो कई छोटे शहरों- जैसे पटना में कॉफी हाउस बंद हो गए हैं जहां रेणु का आना-जाना लगातार होता था।’
इन सबके अलावा पेज थ्री पार्टियों की चुहल का हिस्सा होता है एक ऐसा वर्ग, जो न तो ग्लैमर की दुनिया का हिस्सा है और न ही क्रिएटिव वर्ग का। हां, यह जरूर है कि यह वर्ग धीरे-धीरे इस आ॓र बढ़ जरूर रहा है। दिल्ली-मुंबई के व्यवसायियों की एक कतार इन पेज थ्री पार्टियों में नजर आने लगी है, बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि ये खुद ही ऐसी पार्टियां आयोजित करते हैं। पेज थ्री पर छपने की इनकी ललक इस कदर बढ़ी है कि ये लोग सी-डी ग्रेड के बॉलीवुडिया सितारों को बतौर रकम पेश करके अपनी पार्टी में आमंत्रित करने लगे हैं ताकि इनकी तस्वीर किसी तरह अखबार के में छप सके। पायल रोहतगी, प्रीति झंगियानी, अमृता अरोड़ा, मेघना नायडू जैसी अभिनेत्रियों के अलावा आइटम नंबर करने वाली लड़कियों को भी यहां आमंत्रित किया जाता है। मीडिया ने भी इसका फायदा उठाना शुरू कर दिया है। कई अखबार और चैनल वाले स्पेस बेचने लगे हैं। एक आ॓र जहां इनकी बिक्री बढ़ती है वहीं चैनलों की टीआरपी बढ़ती है और इन पार्टियों का क्रेज भी।

Published in:  on December 8, 2007 at 12:51 pm Leave a Comment

महिला मुक्ति के लिए स्वतंत्र महिला आंदोलन की जरूरत

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महिलाओं के सशक्तीकरण को देखने के पहले सशक्तिकरण के विभिन्न रूपों को देखना जरूरी है। यह सही है कि राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रों में महिलाओं का हस्तक्षेप बढ़ा है। कई राजनीतिक पार्टियों की मुखिया महिलाएं हैं। रोजगार के क्षेत्र में भी महिलाओं की उपस्थिति में उल्लेख्नीय वृद्धि हुई है। आज प्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी है। समाज में महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव आया है। महिलाओं के ऊपर होने वाले अत्याचारों पर अब पहले जैसी खमोशी नहीं रहती। मीडिया से लेकर प्रशासन तक ऐसी घटनाओं पर नोटिस लेता है। एक तरह से जमीन से लेकर आसमान तक महिलाओं अपनी कामयाबी का झंडा बुलंद किया है।
कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसमें जाने से महिलाओं को कोई रोक सके। उनके लिए अवसर के सारे दरवाजे खुले हैं। प्रत्येक जगह वह पुरूष समाज को कड़ी चुनौती पेश कर रही हैं। लेकिन यह पूरी तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पक्ष कुछ और ही बयां करता है। आर्थिक स्तर पर रोजगार में शामिल महिलाओं के ऊपर दबाव बढ़ गया है। कार्यस्थल पर शोषण बढ़ा है। मातृत्व अवकाश बंद कर दिया जा रहा है। महिलाओं को घर-परिवार की जिम्मेदारी के साथ नौकरी करनी पड़ रही है। शिशु-पालन केंद्र न होने से उन्हें और कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
बिहार जैसे प्रांत में महिलाओं की जीत के पीछे वही पितृसत्तात्मक शक्तियां हैं, वही कुर्सी संभाल रहे हैं। बिहार स्थानीय निकाय चुनाव के पोस्टर को देखा जाए तो तस्वीर और साफ हो जाती है। महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की प्रचार सामग्री पर पुरूषों के ही चित्र छपे थे। जहां पतियों की फोटो भारी-भरकम थी वहीं महिला प्रत्याशी के चित्र छोटे तो थे ही, उसके साथ उनका किसी की पत्नी, बहन और मां के रूप का जिक्र था। चुनाव प्रचार में महिलाएं कहीं नहीं दिख रही थीं। ऐपवा की प्रत्याशी जब चुनाव प्रचार में उतरीं तब जाकर दूसरी महिला प्रत्याशियों को उनके घर वालों को भारी मन से भेजना पड़ा। आज बिहार में ऐसे पदों पर जीतकर आई महिलाओं के बगल में उनके पतियों को बैठने की पूरी छूट शासन-प्रशासन से मिली हुई है। ऐपवा जैसे महिला संगठनो के द्वारा संघर्ष के बाद कुछ स्थानों पर यह व्यवस्था खत्म हुई है।
बिहार में राबड़ी देबी के मुख्यमंत्री रहने पर भी लोग उनके पति लालू प्रसाद को ही वास्तविक मुख्यमंत्री मानते रहे। पूरे कार्यकाल तक राबड़ी मात्र कठपुतली बनी रहीं। महिला सशक्तीकरण का यह मॉडल स्वतंत्र अस्तित्व के बिना बेकार है। देश में राजनीति के शीर्ष पर बैठी महिलाओं की बात की जाए तो यह कहा जा सकता है कि जितनी भी महिलाएं राजनीति में हैं वे अपने संघर्ष के बल पर कम और विरासत की राजनीति के बल पर ज्यादा हैं। जयललिता, सोनिया गांधी, मेनका गांधी इसके उदाहरण है। मायावती की राजनीतिक समझ और संघर्ष एक रूप में उन सबसे अलग है, पर आज सोनिया, जयललिता, ममता, मेनका और मायावती की पार्टी में दूसरी कतार में महिला नेताओं का अभाव है। कोई भी महिला नेता इतने बड़े राजनीतिक पद पर पहुंचने के बाद दूसरी महिलाओं को अपने जैसा नहीं बना पाई ऐसा क्यों? इसका सीधा सा कारण है कि ऐसी महिलाएं किसी सहारे के बल पर राजनीति के शिखर पर पहुंची है। ऐसी महिलाएं अपने पुरूष सलाहकारों पर ही निर्भर रहती हैं।
कम्युनिस्ट पार्टियों में एक सिस्टम के तहत महिलाएं आगे बढ़ती हैं। वे पग-पग पर पुरूष सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं। सोनिया गांधी यूपीए की सरकार में चाहे जितनी बड़ी भूमिका में हों लेकिन वे पुरूष सत्ता के खिलाफ नहीं जा सकती हैं। प्रतिभा पाटिल को तो राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर जिता सकती हैं लेकिन पुरूष वर्चस्व के खिलाफ यदि कोई कदम उठाती हैं तो अलगाव में पड़ने का डर है। यही कारण है कि सोनिया भी महिला आरक्षण विधेयक पर सर्वसम्मति का राग अलापती है। चुनाव घोषण पत्र में सारी पार्टियां महिला आरक्षण की बात करती हैं लेकिन संसद में सारे पुरूष सांसदो को अपना वर्चस्व खत्म होने का डर सताने लगता है।
संसद में पहुंची ढेर सारी महिला सांसद भी इस बिल के लिए पहल नहीं करतीं, क्योकि उन्हें लगता है कि ब्राहमणवादी मूल्यों और पुरूष प्रधान समाज में वे अलग-थलग पड़ जाएंगी। महिलाएं आज भी पुरूषों द्वारा निर्धारित मर्यादा के भीतर रह रही हैं। सोनिया गांधी चुनाव प्रचार में आदर्श भारतीय महिला बन कर ही जाती हैं। मेनका, वसुंधरा, सुषमा सबका असली रूप चुनाव के समय पता चलता है। ये सारी महिलाएं पारंपरिक पुरूष वर्चस्ववादी मूल्यों के पक्ष-पोषण में रह कर ही अपनी राजनीति करती हैं। महिला बिल पर उमा भारती ने पिछड़ी महिलाओं को अलग से आरक्षण का मुद्दा उठाकर इस बिल को कमजोर करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। उमा भारती को लगता है कि पिछड़ों पर तो राजनीति करना आसान है लेकिन महिला सवालों को केंद्र में रखने पर वह अलग-थलग पड़ सकती है। यह जोखिम कोई भी नेता या पार्टी उठाने को तैयार नहीं है।
महिलाओं को अपने हितो की लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। कोई पार्टी आसानी से महिला बिल पास नहीं करेगी। इसके लिए संघर्ष करना होगा। आज सफलता की जिस बुलंदी पर महिलाएं पहुंची हैं, उसकी हकदार वे स्वयं हैं। समाजवादी व्यवस्था में भी महिलाओं को अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक मुक्ति के लिए संघर्ष करना होगा। किसी पार्टी से जुड़े महिला संगठन या सरकारी महिला आयोग से महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं है। महिला मुक्ति के लिए भारत में एक स्वतंत्र महिला आंदोलन की जरूरत है।

Published in:  on December 7, 2007 at 7:28 am Leave a Comment

कानून 17, फिर भी बेहाल हैं असंगठित मजदूर

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अगर केंद्र सरकार और इसकी एजेंसियों ने अपने कानूनों को सही तरीके से लागू किया होता तो देश के असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति आज इतनी खराब नहीं होती। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सामाजिक, आर्थिक व व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए अभी तक 17 कानून बनाए जा चुके हैं लेकिन इनमें से किसी भी कानून को सही तरीके से लागू नहीं किया जा सका है। इस बात का खुलासा असंगठित क्षेत्र में उद्यमशिलता पर गठित राष्ट्रीय आयोग (एनसीईयूएस) ने अपनी रिपोर्ट में की है। हालांकि आयोग ने पुराने कानूनों को सही तरीके से लागू करने के बजाय इन मजदूरों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए अलग से एक और व्यापक कानून बनाने का सुझाव दे दिया है। आयोग ने असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लगभग 40 करोड़ मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए दर्जनों सुझाव दिए हैं। इसमें इन मजदूरों को पर्याप्त वेतन देने, इनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने, इनके काम करने के स्थल व वातावरण को सुधारने की बात कही गई है। लेकिन जब आप असंगठित क्षेत्र के मजदूरों से संबंधित मौजूदा कानूनों को देखें तो साफ हो जाता है कि इन सब की व्यवस्था पहले से ही है। यह अलग बात है कि इन कानूनों के बारे में न तो मजदूरों को मालूम है और न ही सरकार इन्हें गंभीरतापूर्वक लागू कर पाई है। उदाहरण के तौर पर एनसीईयूसी ने असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिला मजदूरों को पुरुषों के समान मजदूरी दिलाने के लिए कई सुझाव दिए हैं जबकि हकीकत यह है कि समान पारिश्रमिक कानून, 1978 के तहत इस बारे में पहले से ही प्रावधान हैं। इसमें साफ-साफ कहा गया है कि कोई भी नियोक्ता लिंग के आधार पर अपने मजदूरों के बीच मजदूरी देने में भेद-भाव नहीं कर सकता। इसी तरह से आयोग की रिपोर्ट से साफ होता है कि देश के कई हिस्सों में बंधुआ मजदूरी अभी भी बेधड़क जारी है। आयोग ने इसे समाप्त करने के लिए कई सुझाव दिए हैं। जाहिर है कि वर्ष 1976 में बंधुआ मजदूरी को खत्म करने के लिए बनाए गए कानून को गंभीरता से लागू नहीं किया गया है। इसी तरह से असंगठित क्षेत्र में कार्यरत बाल मजदूरों की सुरक्षा के लिए बाल मजदूर (नियमन व रोक) अधिनियम, 1986 की मदद ली जा सकती है। खतरनाक क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के लिए भी पहले से कानून मौजूद है। आयोग ने पाया है कि खतरनाक माने जाने वाले क्षेत्रों में ज्यादा मजदूर असंगठित क्षेत्र के हैं इसलिए इनकी सुरक्षा के लिए तत्काल उपाय करने की आवश्यकता है। इसी तरह से विस्थापित असंगठित मजदूरों के लिए भी कानून है। यातायात क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों की सुरक्षा मोटर ट्रांसपोर्ट वकर‌र्््स एक्ट, 1961 भी है। दवा उद्योग में कार्यरत श्रमिकों के लिए बिक्री संव‌र्द्धन कर्मचारी (सेवा शर्त) अधिनियम, 1976 है। मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1976, बीड़ी व सिगार वर्कर्स एक्ट, 1966 और कांट्रेक्ट लेबर एक्ट, 1970 जैसे दर्जन भर और कानून हैं जो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति सुधारने में कारगर साबित हो सकते हैं।

Published in:  on December 6, 2007 at 9:56 am Leave a Comment