महिलाओं के सशक्तीकरण को देखने के पहले सशक्तिकरण के विभिन्न रूपों को देखना जरूरी है। यह सही है कि राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रों में महिलाओं का हस्तक्षेप बढ़ा है। कई राजनीतिक पार्टियों की मुखिया महिलाएं हैं। रोजगार के क्षेत्र में भी महिलाओं की उपस्थिति में उल्लेख्नीय वृद्धि हुई है। आज प्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी है। समाज में महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव आया है। महिलाओं के ऊपर होने वाले अत्याचारों पर अब पहले जैसी खमोशी नहीं रहती। मीडिया से लेकर प्रशासन तक ऐसी घटनाओं पर नोटिस लेता है। एक तरह से जमीन से लेकर आसमान तक महिलाओं अपनी कामयाबी का झंडा बुलंद किया है।
कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसमें जाने से महिलाओं को कोई रोक सके। उनके लिए अवसर के सारे दरवाजे खुले हैं। प्रत्येक जगह वह पुरूष समाज को कड़ी चुनौती पेश कर रही हैं। लेकिन यह पूरी तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पक्ष कुछ और ही बयां करता है। आर्थिक स्तर पर रोजगार में शामिल महिलाओं के ऊपर दबाव बढ़ गया है। कार्यस्थल पर शोषण बढ़ा है। मातृत्व अवकाश बंद कर दिया जा रहा है। महिलाओं को घर-परिवार की जिम्मेदारी के साथ नौकरी करनी पड़ रही है। शिशु-पालन केंद्र न होने से उन्हें और कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
बिहार जैसे प्रांत में महिलाओं की जीत के पीछे वही पितृसत्तात्मक शक्तियां हैं, वही कुर्सी संभाल रहे हैं। बिहार स्थानीय निकाय चुनाव के पोस्टर को देखा जाए तो तस्वीर और साफ हो जाती है। महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की प्रचार सामग्री पर पुरूषों के ही चित्र छपे थे। जहां पतियों की फोटो भारी-भरकम थी वहीं महिला प्रत्याशी के चित्र छोटे तो थे ही, उसके साथ उनका किसी की पत्नी, बहन और मां के रूप का जिक्र था। चुनाव प्रचार में महिलाएं कहीं नहीं दिख रही थीं। ऐपवा की प्रत्याशी जब चुनाव प्रचार में उतरीं तब जाकर दूसरी महिला प्रत्याशियों को उनके घर वालों को भारी मन से भेजना पड़ा। आज बिहार में ऐसे पदों पर जीतकर आई महिलाओं के बगल में उनके पतियों को बैठने की पूरी छूट शासन-प्रशासन से मिली हुई है। ऐपवा जैसे महिला संगठनो के द्वारा संघर्ष के बाद कुछ स्थानों पर यह व्यवस्था खत्म हुई है।
बिहार में राबड़ी देबी के मुख्यमंत्री रहने पर भी लोग उनके पति लालू प्रसाद को ही वास्तविक मुख्यमंत्री मानते रहे। पूरे कार्यकाल तक राबड़ी मात्र कठपुतली बनी रहीं। महिला सशक्तीकरण का यह मॉडल स्वतंत्र अस्तित्व के बिना बेकार है। देश में राजनीति के शीर्ष पर बैठी महिलाओं की बात की जाए तो यह कहा जा सकता है कि जितनी भी महिलाएं राजनीति में हैं वे अपने संघर्ष के बल पर कम और विरासत की राजनीति के बल पर ज्यादा हैं। जयललिता, सोनिया गांधी, मेनका गांधी इसके उदाहरण है। मायावती की राजनीतिक समझ और संघर्ष एक रूप में उन सबसे अलग है, पर आज सोनिया, जयललिता, ममता, मेनका और मायावती की पार्टी में दूसरी कतार में महिला नेताओं का अभाव है। कोई भी महिला नेता इतने बड़े राजनीतिक पद पर पहुंचने के बाद दूसरी महिलाओं को अपने जैसा नहीं बना पाई ऐसा क्यों? इसका सीधा सा कारण है कि ऐसी महिलाएं किसी सहारे के बल पर राजनीति के शिखर पर पहुंची है। ऐसी महिलाएं अपने पुरूष सलाहकारों पर ही निर्भर रहती हैं।
कम्युनिस्ट पार्टियों में एक सिस्टम के तहत महिलाएं आगे बढ़ती हैं। वे पग-पग पर पुरूष सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं। सोनिया गांधी यूपीए की सरकार में चाहे जितनी बड़ी भूमिका में हों लेकिन वे पुरूष सत्ता के खिलाफ नहीं जा सकती हैं। प्रतिभा पाटिल को तो राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर जिता सकती हैं लेकिन पुरूष वर्चस्व के खिलाफ यदि कोई कदम उठाती हैं तो अलगाव में पड़ने का डर है। यही कारण है कि सोनिया भी महिला आरक्षण विधेयक पर सर्वसम्मति का राग अलापती है। चुनाव घोषण पत्र में सारी पार्टियां महिला आरक्षण की बात करती हैं लेकिन संसद में सारे पुरूष सांसदो को अपना वर्चस्व खत्म होने का डर सताने लगता है।
संसद में पहुंची ढेर सारी महिला सांसद भी इस बिल के लिए पहल नहीं करतीं, क्योकि उन्हें लगता है कि ब्राहमणवादी मूल्यों और पुरूष प्रधान समाज में वे अलग-थलग पड़ जाएंगी। महिलाएं आज भी पुरूषों द्वारा निर्धारित मर्यादा के भीतर रह रही हैं। सोनिया गांधी चुनाव प्रचार में आदर्श भारतीय महिला बन कर ही जाती हैं। मेनका, वसुंधरा, सुषमा सबका असली रूप चुनाव के समय पता चलता है। ये सारी महिलाएं पारंपरिक पुरूष वर्चस्ववादी मूल्यों के पक्ष-पोषण में रह कर ही अपनी राजनीति करती हैं। महिला बिल पर उमा भारती ने पिछड़ी महिलाओं को अलग से आरक्षण का मुद्दा उठाकर इस बिल को कमजोर करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। उमा भारती को लगता है कि पिछड़ों पर तो राजनीति करना आसान है लेकिन महिला सवालों को केंद्र में रखने पर वह अलग-थलग पड़ सकती है। यह जोखिम कोई भी नेता या पार्टी उठाने को तैयार नहीं है।
महिलाओं को अपने हितो की लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। कोई पार्टी आसानी से महिला बिल पास नहीं करेगी। इसके लिए संघर्ष करना होगा। आज सफलता की जिस बुलंदी पर महिलाएं पहुंची हैं, उसकी हकदार वे स्वयं हैं। समाजवादी व्यवस्था में भी महिलाओं को अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक मुक्ति के लिए संघर्ष करना होगा। किसी पार्टी से जुड़े महिला संगठन या सरकारी महिला आयोग से महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं है। महिला मुक्ति के लिए भारत में एक स्वतंत्र महिला आंदोलन की जरूरत है।
