जिसे हम विशष्टि नाभिकीय क्लब कहते हैं, व्यवहार में उसकी विशष्टिता धीरे-धीरे ध्वस्त होती रही है एवं यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा एवं उसके तीन दिन बाद नागासाकी पर एटमी हमले के साथ अमेरिका एकाएक वैश्विक महाशक्ति का रूतबा पा गया। इस भयावह कदम से युद्ध का पूरा नजारा बदल गया। एक बम पूरे शहर को बरबाद करने के लिए काफी था। निश्चय ही युद्ध के उस डरावने माहौल में अनेक देशों के भीतर एटमी ताकत बनने की आकांक्षाएं कुलबुलाई होंगी। उस समय इस महाविनाशकारी तकनीक पर अमेरिका का एकल अधिकार था। यानी तब एटमी क्लब का वह अकेला सदस्य था। कम्युनिस्ट विचारधारा को दुनिया भर में स्थापित करने के अभियान में लगे सोवियत संघ ने 1949 में धमाका करके अमेरिकी एकल वर्चस्व को चकनाचूर किया एवं वह भी दूसरी महाशक्ति की पदवी पर विराजमान हो गया। दो विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले इन दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा की यह शुरूआत थी एवं सोवियत मानसिकता यह थी कि यदि उसने दुनिया को भयभीत करने वाली इस ताकत का प्रदर्शन नहीं किया तो फिर उसके साथ कोई देश नहीं आना चाहेगा एवं अमेरिका का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा। इस प्रकार एटमी क्लब दो सदस्यीय हुई। सोवियत संघ भले दुनिया में आम आदमी के अधिकारों की रक्षा के नाम पर कम्युनिस्ट व्यवस्था को निर्यात करने का अभियान चल रहा था एवं अमेरिका लोकतंत्र के नाम पर उसका विरोध, किंतु दोनों की मनासिकता यही थी कि यदि किसी तीसरे ने इस क्लब में प्रवेश पा लिया तो उनकी महाशक्ति की वर्चस्ववादी छवि लुंठित हो सकती है। चूंकि ब्रिटेन अमेरिका का सर्वाधिक विश्वसनीय देश बन चुका था इसलिए 1952 में उसके धमाके में सहयोग कर उसने उसे भी क्लब में शामिल कर लिया। लेकिन उसके बाद से दोनों महाशक्तियों की कोशिश ऐसी सख्त व्यवस्था कायम करने की रही ताकि कोई भी अन्य देश इस महाविनाशकारी ताकत को हासिल करने की हिमाकत न करे। वैसे अमेरिका एवं सोवियत संघ को आरंभ में शायद यह कल्पना नहीं थी कि दुनिया को भयाक्रांत करने वाले विनाशकारी अस्त्रोें की उसकी क्षमता को चुनौती मिल सकेगी। किंतु, जब शक्ति संतुलन, प्रभाव विस्तार एवं दुनिया में शक्तिशाली होने की यह कसौटी हो गई हो तो सबकी ललचाई आंखें इस आ॓र लग गईं। फ्रांस ने 13 फरवरी, 1960 को विस्फोट कर अपने लिए उस विशष्टि क्लब का दरवाजा खोल लिया। फ्रांस ने उस समय धमाका किया जब अमेरिका एवं सोवियत संघ ने फ्रांस एवं चीन के इरादों का संकेत मिलने के बाद 1958 से परीक्षणों पर एकतरफा रोक लगाकर जिनेवा में परीक्षणों पर रोक के लिए संधि की तैयारी आंरभ कर दी थी। यह सीधे-सीधे अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन एवं रियलपोलिटिक अवधारणा को चुनौती थी। लेकिन फ्रांस ने इसे अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए अपरिहार्य घोषित किया एवं अंतत: पांच वर्षों बाद वह एटमी क्लब में प्रवेश कर गया। इसके बाद चीन ने 31 अक्टूबर 1964 को धमाका कर यह घोषणा की कि वह नाभिकीय शक्ति है तो शेष चारों शक्तियों को यह सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करें। वास्तव में चीन के इस कदम के बाद ही इस महाविनाशक ताकत को नाभिकीय अप्रसार संधि के दायरे में कैद करके शेष देशों के प्रवेश का रास्ता बिल्कुल बंद करने की व्यवस्था की गई। इसके अनुसार केवल ये पांच देश नाभिकीय संपन्न हैं एवं शेष 185 गैर नाभिकीय देश। इसके बाद सिद्धांत रूप में इस विशेषाधिकार संपन्न क्लब की सदस्यता न केवल स्थायी रूप से बंद हो गई, बल्कि इसमें प्रवेश करने की कोशिश करने वालों के लिए सजा भी निर्धारित हुई। सामंतवादी सोच वाली यह संधि पांचों देशों के नाभिकीय अस्त्रों पर विशेषाधिकार को मान्यता देती है एवं अन्यों को ऐसा करने से वंचित करती है। इसी के सहयोगी के तौर पर परीक्षणों पर पूर्ण प्रतिबंध संबंधी संधि जिसे सीटीबीटी भी कहते हैं, का विकास हुआ। ये दोनों संधियां नाभिकीय क्लब के चारों आ॓र ऐसी सख्त एवं डरावनी बनकर खड़ी हैं जिसके भीतर प्रवेश करने की हिमाकत तक करने वालों की शामत आ जाती है। किंतु कुछ महत्वांकाक्षी देशों ने इसके बावजूद प्रयास जारी रखा। 1970 के दशक में कई देशों ने एक साथ नाभिकीय शक्ति बनकर इस विशष्टि क्लब में प्रवेश की कोशिश की थी। मसलन, दक्षिण कोरिया, जिसे अमेरिका ने इस धमकी के साथ पीछे हटने को मजबूर कर दिया कि ऐसा करने पर वह प्रायद्वीप से अलग हो जाएगा। इजरायल ने 1981 में एक हवाई हमला कर इराक की कोशिशों को विराम दे दिया। लेकिन दक्षिण अफ्रीका एवं अर्जेंटिना ने यह सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि उन्होंने नाभिकीय हथियार बना लिए थे जिसे बाद में नष्ट कर दिया। इजरायल के बारे में तो माना जाता है कि उसके पास नाभिकीय ताकत है। उसके पास नहीं भी हो तो भी वह अमेरिकी नाभिकीय छतरी तले है। लीबिया एवं ईरान उन देशों में हैं जो लंबे समय से नाभिकीय ताकत बनने की जुगत लगा रहे हैं। उत्तर कोरिया 1980 के दशक से ही नाभिकीय ताकत विकसित करने में लगा था। उसके साथ 1984 से ही बातचीत चली एवं 1994 में बातचीत के ढांचे पर सहमति भी हुई। लेकिन उसे मनाना संभव नहीं हुआ। उसने पिछले वर्षो में धमाका करके स्वयं को नाभिकीय ताकत घोषित कर दिया। इसके पहले उसने अप्रसार संधि एवं सीटीबीटी से अपने को अलग करने की घोषणा कर दी। इसका प्रभाव चारों आ॓र दिख रहा है। वास्तव में यह स्वीकार करना चाहिए कि अप्रसार संधि या अन्य भेदभाव कारी व्यवस्थाएं दृढ़ निश्चयी देशों को नाभिकीय ताकत हासिल करने से रोकने में अक्षम है। कम से कम इसका कोई नैतिक प्रभाव तो विश्व मानस पर नहीं ही है।क्लब के विशष्टि सदस्य किस प्रकार का पाखण्ड एवं दोहरा आचरण बरतते हैं उसका एक उदाहरण चीन है। चीन ने धमाके के साथ तीसरी दुनिया के देशों के ऐसे हितैषी नेता की छवि बनाने की कोशिश की थी, जो न केवल भेदभावमूलक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का सक्रिय विरोध करता है, बल्कि उन छोटे एवं पिछड़े देशों के हितों की सुरक्षा के लिए भी खड़ा है जिनके पास तकनीकी सामर्थ्य एवं राजनीतिक कौशल का अभाव है। दूसरे शब्दों में उसका संदेश यह था कि उसने तीसरी दुनिया के प्रतिनिधि के नाते विस्फोट कर शक्तिसंपन्न देशों को चुनौती दी है। किंतु इसने भी उसी भेदभावकारी सामंती व्यवस्था को स्वीकार कर 1992 में अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किया तथा 1995 में इस संधि की आयु सीमा को अनिश्चितकाल तक बढ़ाने के निर्णय का समर्थन कर स्वयं को तीसरी दुनिया में एकमात्र नाभिकीय शक्ति बने रहने की पुख्ता व्यवस्था की। भारत ने पहले 1974 एवं फिर 1998 में पोखरण परीक्षण द्वारा चीन की इस विशष्टि स्थिति को तो ध्वस्त किया ही, पांच सदस्यीय विशष्टि क्लब की दीवार के समानांतर एक अस्पृश्य सदृश छोटा ही सही एकल बसेरा स्थापित किया। विस्फोट के साथ नाभिकीय अस्त्र क्षमता का सबूत देने के बावजूद पाकिस्तान की स्थिति संभ्रम वाली रही। वह यह तय ही नहीं कर पाया कि पुरानी अवधारणा के अनुसार वह इसे इस्लामी बम करार दे या कुछ और। वह अभी तक इस ऊहापोह की मन:स्थिति से गुजर रहा है। बावजूद इसके इन दोनों देशों की भूमिका ने क्लब के दरवाजे पर तो दस्तखत दे ही दी। पोखरण द्वितीय के बाद सबसे आक्रामक देश चीन ही था जिसने विभिन्न तर्कों से यह साबित करने की कोशिश की कि अमेरिका एवं रूस वैधानिक रूप से भारत की नाभिकीय क्षमता को वापस शून्य तक लाने के लिए कार्रवाई करने को बाध्य हैं। यह बात दीगर है कि अमेरिका एवं रूस ने इसके विपरीत धीरे-धीरे भारत के साथ सहयोग की नीति अपनाई है। निश्चित तौर पर चीन को यह अंतर्मन से स्वीकार नहीं है। एशिया एवं अफ्रीकी देशों का नेता बनने का उसका सपना इससे टूट रहा है। लेकिन चीन अतीत के प्रसंगों एवं नाभिकीय शक्ति के संदर्भ में दुनिया के बदलते मनोविज्ञान को शायद नजरअंदाज कर रहा है। यदि दक्षिण कोरिया को अमेरिका रोक सका तो इस कारण कि दक्षिण कोरिया ही नहीं, जापान एवं दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों को अमेरिकी रवानगी की संभावना ने भयभीत कर दिया था। शीतयुद्व काल में दोनों खेमों के देश अपनी महाशक्ति से रक्षा के लिए आगे आने की उम्मीद करते थे। द. कोरिया को तो अमेरिका ने वायदा किया था कि किसी विपरीत स्थिति में वह उ. कोरियापर हमला कर देगा। हालांकि उसने चीन के संबंध में ऐसा नहीं कहा है। इसलिए जापान में नाभिकीय हथियार बनाने की मांग उठ रही है। ईरान के अड़ियल रवैये के कारण पश्चिम एशिया के सऊदी अरब, मिस्र जैसे देशों की बेचैनी बढ़ रही है। वास्तव में नाभिकीय क्लब की विशष्टिता के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं इतनी एकपक्षीय हैं कि इसके विरूद्ध विद्रोह उबलना स्वाभाविक है। हालांकि अप्रसार संधि का अंतिम लक्ष्य नाभिकीय अस्त्रों का सम्पूर्ण नाश है, किंतु पांचों में से कोई देश इसकी पहल को तैयार नहीं है। सीटीबीटी को इस लक्ष्य की पूर्ति की सीढ़ी बताया गया, लेकिन अमेरिका ही इस संधि का अनुमोदन नहीं कर पाया है। यह बात अलग है कि उसने अपनी आ॓र परीक्षणों पर एकतरफा रोक लगा रखी है। कुछ देशों को नाभिकीय आपूर्ति समूह में शामिल कर विशष्टिता का दर्जा दिया गया। इससे उनके अहं की तुष्टि होती है। लेकिन जो देश इन सबसे बाहर हैं उनके लिए आखिर रास्ता क्या है? पाकिस्तान के अब्दुल कादिर खान जैसे नाभिकीय वैज्ञानिक उनके लिए उम्मीद की किरण हैं, जो चोरी से तकनीक एवं उपाय दोनों प्रदान करने के लिए आगे आते हैं। लीबिया के राष्ट्रपति कर्नल गद्दाफी के पुत्र ने कहा कि उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि नाभिकीय बम बनाने का तरीका कितनी आसानी से हासिल किया जा सकता है। वास्तव में पूरी स्थिति डरावनी है एवं नाभिकीय क्लब के बने रहने से सभ्यता के विनाश एवं भूमंडल के श्मशान व कब्रगाह में तब्दील होने का खतरा बना हुआ है।
पाकिस्तान में एटमी माशर्ल लॉ
पड़ोसी देश पाकिस्तान के सामने हालात इधर कुआं और उधर खाईं वाले हैं। इमर्जेंसी के नाम पर जनरल परवेज मुशर्रफ ने जो व्यवस्था वहां लागू कर दी है, उसे इमर्जेंसी कहना भी गलत है। संविधान शासित किसी भी देश में इमर्जेंसी या आपातकाल एक संविधान सम्मत व्यवस्था ही हुआ करती है, जिसमें जनता के अधिकार और राज्य के कर्त्तव्य से जुड़ी कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं किसी सच्चे या झूठे खतरे के नाम पर इस वायदे के साथ कुछ समय के लिए निलंबित कर दी जाती हैं, कि यह समय गुजर जाने के बाद इन्हें वापस बहाल कर दिया जाएगा। जनरल द्वारा लागू की गई मौजूदा व्यवस्था के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। उन्होंने 1973 में बने पाकिस्तान के संविधान को ही एक झटके में कूड़ेदान के हवाले कर दिया है और किसी निर्धारित व्यवस्था का हवाला देते हुए ऐसा कोई वायदा भी नहीं किया है कि कितने समय के बाद मौजूदा व्यवस्था को समाप्त करके वहां पुरानी या कोई नई संवैधानिक व्यवस्था लागू कर दी जाएगी। साढ़े सोलह करोड़ की आबादी वाले एक परमाणु शक्ति संपन्न देश में इस तरह की अर्ध-बर्बर शासन व्यवस्था का लागू होना उस देश के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए कितनी खतरनाक बात है, एकबारगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। यहां हाल ही में प्रकाशित एक अमेरिकी रणनीतिकार की किताब में उद्धृत एक तथ्य को ध्यान में रखें तो इस खतरे की एक झलक महसूस की जा सकती है। उक्त किताब में भरोसेमंद सूत्रों को आधार बनाते हुए बताया गया है कि करगिल युद्ध में अपनी पिटाई तय जानकर पाकिस्तानी फौज ने भारत के खिलाफ परमाणु बम इस्तेमाल करने का मन बना लिया था। गौरतलब है कि उस समय पाकिस्तान में नवाज शरीफ की हुकूमत थी और अमेरिकी दबाव से किसी तरह कगार पर खड़ा मामला काबू में आ गया। आज जब वहां हुकूमत के सारे तौर फौजियों के ही हाथ में हैं तो कब क्या हो जाएगा, कौन जानता है। विडंबना यह है कि इसका दूसरा पहलू और भी ज्यादा खतरनाक है। पाकिस्तान के उत्तरी और पश्चिमी कबीलाई इलाकों में एक अर्से से डेरा जमाए इस्लामी आतंकवादी तत्व लाल मस्जिद की घटना के बाद से राजधानी इस्लामाबाद और आर्थिक राजधानी कराची समेत पूरे पाकिस्तान में अपनी धमक जमा चुके हैं। समाज की तरफ से इकलौता विरोध उन्हें अभी तक देश के पढ़े-लिखे शहराती मध्यवर्ग की तरफ से झेलना पड़ रहा था, लेकिन मुशर्रफ के अघोषित मार्शल लॉ से उसके एक हिस्से की सहानुभूति भी इस शासन के खिलाफ लड़ रही जेहादी ताकतों के साथ हो सकती है। इन बारूदी हालात में जेहादी सोच वाले पाकिस्तानी फौज के किसी हिस्से ने अगर कभी मुशर्रफ का तख्ता पलटने का फैसला कर लिया तो यह आतंकवाद से जुड़े दुनिया के सबसे भयावह दु:स्वप्नों के सच होने जैसा होगा। पाकिस्तानी जनता से ज्यादा यह विश्व राजनय की परीक्षा है।
आतंकवाद और पाकिस्तान
9/11 के बाद से दुनिया भर के रणनीति विशेषज्ञों के बीच पाकिस्तान की चर्चा आतंकवाद की नई धुरी के रूप में होने लगी है। बीच-बीच में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ऐसी ब्योरेवार खबरें प्रकाशित हो रही हैं कि कैसे पाकिस्तान में आतंकवादियों को अपनी गतिविधियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना हासिल हो रहा है। अमेरिका भी अपने आतंकवाद विरोधी युद्ध के हिस्से के रूप में अंतरराष्ट्रीय सीमाएं पार कर पाकिस्तान के भीतर आतंकवादियों पर सीधी चढ़ाई करने के बारे में सोच रहा है। इस उभरती हुई नई परिस्थिति में जिस पहले सवाल का जवाब खोजने की जरूरत है, वह यह है कि पाकिस्तान आखिर कैसे एक आतंकवाद प्रायोजक राज्य में बदल गया?
इस सवाल का जवाब ढ़ंढते हुए संक्षेप में पाकिस्तान के इतिहास का जायजा लेना जरूरी है। स्वतंत्र होने के कुछ ही महीनों के भीतर पाकिस्तानी फौज इस नतीजे पर पहुंच गई कि अनियमित युद्ध को उसे राज्य कौशल का एक अंग मानकर चलना होगा। इस नीति की पहली झलक अक्टूबर 1947 में भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य में पाकिस्तानी घुसपैठ के रूप में देखने को मिल गई। पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक यह घुसपैठ लश्करों द्वारा की गई। यह एक अलग ही कहानी है कि लश्करों को जरिया बनाकर संपा की गई इस गतिविधि का कोई फायदा उस समय पाकिस्तान को नहीं मिला।
बहरहाल, अगले तीस वषा में पाकिस्तान ने यह विकल्प खुला रखा। अफगानिस्तान में सोवियत दखल के बाद 1981 में इस अवधारणा को पुनर्जीवित करने का पहला अवसर उपलब्ध हुआ।
शीतयुद्ध की राजनीति के तहत अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप के लिए उसे सबक सिखाने का फैसला किया। अफगानिस्तान में चले इस अघोषित युद्ध में कई देशों ने हिस्सा लिया। पाकिस्तान में मौजूद अफगान शरणार्थी रातोंरात मुजाहिदीन बन गए। अमेरिका के सबसे तेज-तर्रार दिमागों ने इन मुजाहिदीनों की दीक्षा के लिए विचारधारात्मक पृष्ठभूमि तैयार की। सऊदियों ने इन मुजाहिदीनों को छापामार युद्ध में प्रशिक्षित करने के लिए भरपूर वित्ताीय सहायता प्रदान की। पाकिस्तान ने स्वेच्छा से खुद को सोवियत संघ के विरूद्ध अमेरिकी नेतृत्व में चलने वाले इस युद्ध के लिए खुद को अग्रिम मोर्चे के देश के रूप में प्रस्तुत किया। अमेरिका और सऊदी अरब द्वारा समूची इस्लामी दुनिया में अपील जारी की गई कि बतौर खुदाई खिदमतगार लोग मुजाहिदीन कतारों में शामिल हों। इस अपील के असर में मुजाहिदीन के साथ आ जुड़ने वालों में एक नाम आ॓सामा बिन लादेन का भी था।
एक आकलन के अनुसार सोवियत संघ के विरूद्ध पूरे आठ साल चले इस युद्ध में 120 देशों ने हिस्सेदारी की और पाकिस्तानी फौज के जरिए मुजाहिदीनों को एक लाख टन हथियार और गोला-बारूद की आर्पूित की गई। इस प्रक्रिया में पाकिस्तानी सैन्य बलों और गुप्तचर संस्थाओं की मुजाहिदीनों के साथ बनती एकता को भी रेखांकित किया गया। 1988 में अफगानिस्तान से सोवियत वापसी के बाद करपंथी इस्लामी विचारधारा अपना चुके कुछ मुजाहिदीन गुटों ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि वे एक महाशक्ति (सोवियत संघ) को परास्त कर चुके हैं और अपनी विचारधारात्मक प्रेरणा से वे संसार की किसी भी ताकत को हरा सकते हैं।
दरअसल, पाकिस्तानी सत्ताा प्रतिष्ठान में बैठे बहुत सारे लोग भी यह मानने लगे थे कि इन करपंथी इस्लामी गुटों के जरिए वे अपने बहुतेरे सैन्य उद्देश्यों की र्पूित कर सकते हैं। यहां तक कि बेनजीर भुो और नवाज शरीफ जैसे निर्वाचित प्रधानमंत्रियों का नजरिया भी कुछ ऐसा ही हो चला था। बेनजीर की कैबिनेट में शामिल गृहमंत्री लेफ्टिनेंट जनरल नसरूल्ला बब्बर ने आईएसआई और डीएमआई के साथ मिलकर 1990 के दशक के प्रारंभ में तालिबान की वैचारिक रूपरेखा तैयार की और मुल्ला उमर को इसका मुखिया चुना। अगले एक दशक की अवधि में पाकिस्तान-अफगानिस्तान संसार भर में करपंथी इस्लामी गुटों की प्रजनन भूमि के रूप में स्थापित हो गए। एक आकलन के मुताबिक पाकिस्तान में तब 60 हजार मदरसे काम कर रहे थे और हर मदरसे में कम से कम 200 छात्र पवित्र ग्रंथ का अध्ययन कर रहे थे। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब एक करोड़ लोग इन मदरसों में पढ़ रहे थे। उनका दस प्रतिशत भी जेहादी गुटों से जुड़ा हो तो यह संख्या दस लाख ठहरती है।
इन सभी गतिविधियों का वित्तापोषण नशीले पदाथा के व्यापार, अमीर अरब देशों द्वारा पूरी फराखदिली से मुहैया कराई जा रही मदद और दानदाता संगठनों के जरिए हो रहा था। शुरू में सोवियत संघ के विरूद्ध जारी लड़ाई के दौरान अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा बहुतायत में उपलब्ध कराए गए हथियार जेहादियों के बड़े काम आए। बाद के सालों में सोवियत संघ के विघटन से भी जेहादियों को हथियार खरीदने का एक बड़ा स्रोत हासिल हो गया।
1990 के दशक में विभिा जेहादी संगठनों के बीच चली बहसों से यह विचार उभरता दिखाई पड़ा कि अमेरिका मुख्य शैतान है और वह इस्लामी दुनिया की संपदा का शोषण कर रहा है। फरवरी 1998 में आ॓सामा बिन लादेन द्वारा अमेरिका और इजराइल के विरूद्ध युद्ध के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना की गई, जिसके तुरंत बाद दुनिया भर में मौजूद अमेरिकी परिसंपत्तिायों पर हमलों की एक पूरी श्रृंखला देखने को मिली। इसकी परिणति 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और वाशिगटन डीसी स्थित पेंटागन पर हुए हमलों में हुई।
करपंथी इस्लामी गुटों द्वारा किए गए इस हमले की प्रतिक्रिया में अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जिस युद्ध की शुरूआत की, उसके अभी तक सीमित नतीजे ही हासिल हो सके हैं। अक्टूबर 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले मेें वहां काम कर रहे करपंथी इस्लामी गुटों के कई अड्डे और उनका जमीनी ढांचा नष्ट हो गया। अमेरिकी युद्ध ने पाकिस्तानी सैन्य बलों को अपने काफी नजदीकी तालिबान और अल-कायदा जैसे संगठनों पर से अपनी छत्रछाया हटाने को मजबूर कर दिया। एक पर्यवेक्षक के अनुसार पाकिस्तानी फौज में तालिबान/अल-कायदा के समर्थन को लेकर ऊपर से नीचे तक दो-फाड़ हो जाने की नौबत आ गई है। माना जा रहा है कि पाकिस्तानी सैन्य बलों में 40 प्रतिशत से ज्यादा लोग तालिबान और अल-कायदा की कर इस्लामी विचारधारा में यकीन रखते हैं। पाकिस्तानी मीडिया में इस आशय की रिपोट अक्सर छप रही हैं कि निचले स्तर के खुफिया कर्मी सैन्य बलों द्वारा संभावित हमलों की अग्रिम सूचना तालिबान और अल-कायदा के कार्यकर्ताओं तक जल्द से जल्द पहुंचा देते हैं।
हाल के वषा में, खासकर सन् 2007 की शुरूआत से ऐसी कई रिपोट आई हैं, जिनमें बताया गया है कि किस तरह तालिबान और अल-कायदा ने क्वेटा (बलूचिस्तान), पेशावर (उत्तार-पश्चिमी सीमाप्रांत) और वजीरिस्तान जैसे संघ प्रशासित कबाइली क्षेत्रों में अपने लिए आरामदेह इलाके कायम कर लिए हैं।
न्यूजवीक में हाल ही में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक आज की दुनिया में पाकिस्तान सबसे खतरनाक जगह है। न्यूजवीक का कहना है, ‘अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों के बरक्स पाकिस्तान के पास ऐसी हर चीज है, जिसकी इच्छा अल-कायदा प्रमुख आ॓सामा बिन लादेन को हो सकती है: राजनीतिक अस्थिरता, इस्लामी चरमपंथियों का एक भरोसेमंद ढांचा, पश्चिम-विरोधी क्रुद्ध रंगरूटों की बहुतायत, एकांत में स्थित प्रशिक्षण क्षेत्र और ऐसे सुरक्षा सेवाएं, जो हमेशा वह नहीं करतीं, जो करने की उम्मीद उनसे की जाती है।’
इसके अलावा पाकिस्तान की नाभिकीय महत्वाकांक्षाओं की भी कोई सीमा नहीं है। पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम के जन्मदाता ए. क्यू. खान ने समूची इस्लामी दुनिया में नाभिकीय हथियार बनाने का बाकायदा एक गुप्त ढांचा तैयार कर दिया था, ताकि शैतानी ताकतों के खिलाफ इस दायरे में ज्यादा से ज्यादा नाभिकीय शक्तियों को खड़ा किया जा सके। यह ढांचा अपनी शुरूआत में ही पकड़ में आ गया, लेकिन नाभिकीय अस्त्र विस्तार के मामले में तबतक काफी नुकसान हो चुका था। पाकिस्तान आज जितनी अस्थिर परिस्थिति से गुजर रहा है, आतंकवाद यहां के माहौल में जितने भयंकर रूपों में अभिव्यक्ति पा रहा है, उसे देखते हुए इसके नाभिकीय आतंकवाद का केंद्र बन जाने की पूरी संभावना है। अंतरराष्ट्रीय रणनीति विशेषज्ञों के मुताबिक इससे बुरा परिश्य और कोई हो नहीं सकता।
यहां भारत में साउथ ब्लॉक में बैठे अधिकारियों को पाकिस्तान में हो रहे इन विकासों पर कड़ी नजर रखनी होगी, ताकि नाभिकीय आतंकवाद के मुकाबले के लिए वे अभी से कुछ जरूरी नीतियां सूत्रबद्ध कर सकें।


