बढ रहा देह व्यापार

prostitution1.jpg

अब सेक्स की मंडी में ग्राहकों की भीड़ केवल मौज मस्ती या शारीरिक सुख के लिए ही नहीं लगती। इस मंडी से खरीदा गया माल आफिस में तरक्की का मार्ग खोल देता है, चुनाव का टिकट दिला देता है, बड़े से बड़े टेंडर दिला देता है। यही कारण है कि अब सेक्स के बाजार में सिक्कों की चमक पहले से कहीं ज्यादा है और बड़ी तादाद में लड़कियां इस कारोबार की आ॓र आकर्षित हो रही हैं।एक जमाना था जब रेड लाइट एरिया से पकड़ी जाने वाली औरतें अपनी मजबूरियां बताती थीं, लेकिन अब पकड़ी जाने वाली अधिकतर लड़कियों के सामने मजबूरी नहीं बल्कि फाइव स्टार होटलों का ग्लैमर, सिक्कों की चमक और बढ़ती महत्वाकांक्षा है। कभी रेडलाइट एरिया और गली मोहल्लों में सिमटा यह धंधा अब बड़ी कोठियों, फार्म हाउस और बड़े होटलों तक पहुंच गया है। अब मसाज सेंटर या ब्यूटी पार्लर का भी इस्तेमाल इस धंधे में कम होता है ताकि इसमें शामिल लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा बरकरार रहे। रेड लाइट एरिया तक जाने में बदनामी का डर रहता है लेकिन आज के हाई प्रोफाइल सेक्स बाजार में कोई बदनामी नहीं, क्योंकि ग्राहक को मनचाही जगह पर मनचाहा माल उपलब्ध हो जाता है और किसी को कानों कान खबर तक नहीं होती। बस मोबाइल पर एक कॉल और इंटरनेट पर एक क्लिक से मनचाही कॉलगर्ल आसानी से उपलब्ध हो जाती है। हालांकि मजदूर वर्ग और लो प्रोफाइल लोगों के लिए अब भी रेडलाइट एरिया की गलियां खुली हैं लेकिन एचआईवी संक्रमण के खतरों ने वहां भीड़ कम जरूर कर दी है।अब इस कारोबार में न केवल विदेशी लड़कियां शामिल हैं बल्कि मॉडल्स, कॉलेज गर्ल्स और बहुत जल्दी ऊंची छलांग लगाने की मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षी लड़कियों की संख्या भी बढ़ रही है। पुलिस के बड़े अधिकारी भी मानते हैं कि अब कॉलगर्ल और दलालों की पहचान मुश्किल हो गई है क्योंकि इनकी वेशभूषा, पहनावा व भाषा हाई प्रोफाइल है और उनका काम करने का ढंग पूरी तरह सुरक्षित है। यह न केवल विदेशों से कॉलगर्ल्स मंगाते हैं बल्कि बड़ी कंपनियों के मेहमानों के साथ कॉलगर्ल्स को विदेश की सैर भी कराते हैं। कॉलगर्ल्स और दलालों का नेटवर्क दो स्तरों पर है। एक अत्यंत हाईप्रोफाइल है जिसमें फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली और आधुनिक वेशभूषा वाली हाई फाई कॉलगर्ल हैं तो दूसरा नेटवर्क महाराष्ट्र, सिक्किम, पश्चिमी बंगाल, बिहार, नेपाल और भूटान से लाई गई बेबस लड़कियों का है। ग्राहक की मांग के अनुसार ही कॉलगर्ल उपलब्ध कराई जाती है।सेक्स के इस कारोबार में नये ग्राहक को प्रवेश बहुत मुश्किल से मिलता है। पकडे़ जाने के डर से केवल पुराने व नियमित ग्राहकों को ही प्राथमिकता दी जाती है। जगह की व्यवस्था करने का रिस्क भी इस धंधे में लगे लोग नहीं लेते। यह व्यवस्था ग्राहक को स्वयं करनी होती है। ग्राहक को एक निश्चित स्थान पर कॉलगर्ल की डिलीवरी किसी मंहगी कार के माध्यम से कर दी जाती है। वहां से ग्राहक अपने वाहन से उसको मनचाहे स्थान पर ले जाता है। अमूमन यह स्थान बड़े होटल, बड़ी कोठियां या फिर फार्म हाउस होते हैं। दलाल पोर्न वेबसाइटों के जरिए एक-दूसरे से सम्पर्क साध कर अपना नेटवर्क मजबूत बनाते हैं। इंटरनेट पर हजारों ऐसी साइटें हैं जहां कॉलगर्ल्स की फोटो व उनका प्रोफाइल उपलब्ध रहता है जिन्हें देखकर ग्राहक अपना ऑर्डर बुक कर सकते हैं। दिल्ली पुलिस के उपायुक्त देवेश चंद श्रीवास्तव के अनुसार, ‘विश्वसनीयता इस धंधे का प्रमुख हिस्सा है। कॉलगर्ल सीधी डील नहीं करती और किसी भी कीमत पर किसी नये ग्राहक से डील नहीं की जाती। पुराने सम्पर्क के आधार पर ही डील की जाती है। यही कारण है कि पुलिस जल्दी से इनकी पहचान नहीं कर पाती। इस धंधे में लगे लोगों के अपने कोडवर्ड हैं जिनका इस्तेमाल कर वह ग्राहकों से बातचीत करते हैं।वो जमाना गया जब किसी भी कॉलगर्ल या सेक्स वर्कर तक पहुंचने के लिए टैक्सी ड्राइवर, ऑटो चालक या किसी नुक्कड़ के पान विक्रेता को टटोलना पड़ता था, क्योंकि वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं के दलाल अक्सर इसी वर्ग के होते थे। यह दलाल ग्राहक को ठिकाने तक पहुंचाने के बाद बाकायदा वसूली करते थे। ऐसे कुछ दलाल ग्राहक और वेश्या दोनों से दलाली लेते थे जबकि कुछ केवल वेश्या से ही अपना हिस्सा मांगते थे लेकिन अब इस तरह के दलालों का जमाना गये वक्त की बात हो गई है।

सेक्स के कारोबार में अब दलालों की पहचान बदल गई है। वे हाई प्रोफाइल हो गये हैं, सेक्स कारोबारी बन गये हैं। ये सुसज्जित कार्यालयों में बैठते हैं और इनकी रिशेप्सनिस्ट ईमेल और मोबाइल पर आने वाली सूचनाओं के आधार पर कॉलगर्ल्स की बुकिंग करती है। ईमेल या मोबाइल पर ही ग्राहक को डिलीवरी का स्थान बता दिया जाता है और फिर निश्चित स्थान पर पूरी रकम एडवांस लेने के बाद कॉलगर्ल की डिलीवरी कर दी जाती है। जिस तरह व्यापारी अपने व्यापार में माल की क्वालिटी, ग्राहकों की पसंद, दुकान की ख्याति, स्टेंडर्ड आदि का ध्यान रखता है, उसी तरह सेक्स के ये कारोबारी भी अपने व्यापार को लेकर बहुत सजग हैं। वह अपने पास हर तरह का माल रखना पसंद करते हैं ताकि कोई ग्राहक खाली न लौटे। ग्राहक की पुलिस से सुरक्षा व पूर्ण संतुष्टि का भी दलाल ख्याल रखते हैं ताकि वह उनका स्थायी ग्राहक बना रहे। अब कॉलगर्ल या ग्राहक से इन्हें दलाली नहीं मिलती बल्कि यह खुद सौदा करते हैं और कॉलगर्ल्स को अपने यहां ठेके पर या फिर वेतन पर रखते हैं। उस अवधि में ठेकेदार इनकी सप्लाई कर कितना कमाता है इससे इन्हें कोई मतलब नहीं होता। जिस प्रकार किसी कर्मचारी के लिए काम के घंटे व छुट्टी के दिन निर्धारित होते हैं, उसी पर ठेके या वेतन पर काम करने वाली कॉलगर्ल्स के भी काम और आराम के दिन निर्र्धारित होते हैं। काम की एक रात के बाद उनकी अगली रात अमूनन आराम की होती है लेकिन अगली रात की भी मांग हो तो इन्हें अतिरिक्त भुगतान मिलता है।

Published in:  on November 18, 2007 at 1:07 pm Comments (3)

नन्दीग्राम में शांति जरूरी

nandigramtense.jpg

नंदीग्राम में भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के जुलूस पर गोलियां बरसाकर माकपा ने अपना क्रूञ्र चेहरा ही नहीं दिखाया है, बल्कि अब भीतरी आलोचना से वाममोर्चे में दरार भी पड़ गई है। करीब दस महीने बाद नंदीग्राम में फिर हुई हिंसा से साफ है कि माकपा नेतृत्व इस मसले को हल करने में विफल रहा है। यह शुरू से स्पष्ट है कि नंदीग्राम की लड़ाई दरअसल स्थानीय माकपा नेतृत्व की मूंछ की लड़ाई है। पिछली बार जब वहां खून-खराबा हुआ था, तो माकपा नेतृत्व ने जताया था कि परिस्थिति के आकलन में उससे चूक हुई है। सवाल यह है कि लगभग दस महीने बाद भी नंदीग्राम के हालात जस के तस क्‍यों हैं। शनिवार को निहत्थे लोगों पर गोलियां क्‍यों चलीं? इसके दो ही जवाब हो सकते हैं। या तो माकपा नेतृत्व ने इस मसले का हल निकालने की गंभीरता से कोशिश नहीं की। या वह खुद भी किसानों को निशाना बनाने की इस खूनी हिंसा में शरीक है। माकपा कार्यकर्ताओं की हिंसा के परिप्रेक्ष्य में पुलिस प्रशासन के चुपचाप बैठे रहने से भी इस आशंका को बल मिलता है। माकपा वह पार्टी है, जो दूसरे राजनीतिक दलों को न्याय, इंसाफ और पारदर्शिता का पाठ पढ़ाती रहती है। लेकिन नंदीग्राम में उसका रवैया देखिए। शनिवार की हिंसा में अनेक लोग मारे गए हैं। इसके ब्‍योरे हैं कि माकपा कार्यकर्ता लाशों को उठा-उठाकर कहीं और ले गए हैं, ताकि इनकी गिनती उनकी पोल न खोल दे। राज्यपाल ने नंदीग्राम को युद्धभूमि की संज्ञा दी है। लेकिन इस पर शर्मसार होने के बजाय माकपा राज्यपाल को सांविधानिक तौर-तरीके की सीख दे रही है! नंदीग्राम को गुजरात बताने वाली कोई और नहीं, माकपा की सहयोगी पार्टी आरएसपी है, जिसके एक मंत्री इस हत्याकांड के विरोध में इस्तीफा देने की बात कर रहे हैं। वाममोचां सरकार के तीन दशक के शासनकाल में कदाचित यह पहला मौका है, जब इसका एक सहयोगी सरकार से अलग होने की बात कर रहा है। ममता बनर्जी के अभियान और लोकसभा से इस्तीफे को विरोध की राजनीति का हिस्सा मान सकते हैं। लेकिन सैकड़ों बुद्धिजीवियों के अनशन पर बैठने और कोलकाता फिल्म महोत्सव पर इसकी काली छाया पडऩे के गंभीर निहितार्थ हैं। महाश्वेता देवी तो सिंगुर में हुई हिंसा के समय से ही वाममोर्चे का विरोध कर रही हैं। शनिवार को नंदीग्राम में दूसरी बार की हिंसा ने चिदानंद दासगुप्ता, अपर्णा सेन और रितुपर्णों घोष जैसे फिल्मकारों को भी सरकार के विरोध में ला खड़ा कर दिया है। माकपा कार्यकर्ताओं ने मेधा पाटकर के साथ जिस तरह बदसुलूकी की और ममता बनर्जी के काफिले को जगह-जगह रोककर जिस तरह परेशान किया, उससे भी देश भर में प्रतिकूल संदेश गया है। केंद्र भले ही यूपीए को एकजुट रखने के लिए माकपा के प्रति सख्‍त न हो रहा हो, लेकिन बुद्धदेव सरकार को संयम बरतने का निर्देश तो दिया ही जा सकता है। इसके अलावा पीडितों को न्याय दिलाने और दोषी कार्यकर्ताओं को दंडित करने के लिए भी राज्य सरकार पर दबाव बनाना होगा। राज्य सरकार विशेषकर माकपा को नन्दीग्राम की ओर विशेष ध्यान देना होगा, क्‍योंकि वहां की भयावह स्थिति की लपट राज्य के अन्य क्षेत्रों को अपने आगोश में ले सकती है। इसलिए सरकार को अविलम्‍ब नन्दीग्राम में बर्चस्व की लड़ाई को खत्म करनी चाहिए, ताकि वहां शांति की स्थापना हो सके। नन्दीग्राम में हो रही हिंसा को देखते हुए आज विपक्षी दलों द्वारा पश्चिम बंगाल बंद का आह्वान किया गया, जिसने सम्‍पूर्ण राज्य को अचल कर दिया । इससे केञ्वल सरकार को तो नुकसान हुआ ही है, आमलोगों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है।

Published in:  on November 13, 2007 at 3:08 pm Leave a Comment

पाकिस्तान में एटमी माशर्ल लॉ

1.jpg

पड़ोसी देश पाकिस्तान के सामने हालात इधर कुआं और उधर खाईं वाले हैं। इमर्जेंसी के नाम पर जनरल परवेज मुशर्रफ ने जो व्यवस्था वहां लागू कर दी है, उसे इमर्जेंसी कहना भी गलत है। संविधान शासित किसी भी देश में इमर्जेंसी या आपातकाल एक संविधान सम्मत व्यवस्था ही हुआ करती है, जिसमें जनता के अधिकार और राज्य के कर्त्तव्य से जुड़ी कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं किसी सच्चे या झूठे खतरे के नाम पर इस वायदे के साथ कुछ समय के लिए निलंबित कर दी जाती हैं, कि यह समय गुजर जाने के बाद इन्हें वापस बहाल कर दिया जाएगा। जनरल द्वारा लागू की गई मौजूदा व्यवस्था के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। उन्होंने 1973 में बने पाकिस्तान के संविधान को ही एक झटके में कूड़ेदान के हवाले कर दिया है और किसी निर्धारित व्यवस्था का हवाला देते हुए ऐसा कोई वायदा भी नहीं किया है कि कितने समय के बाद मौजूदा व्यवस्था को समाप्त करके वहां पुरानी या कोई नई संवैधानिक व्यवस्था लागू कर दी जाएगी। साढ़े सोलह करोड़ की आबादी वाले एक परमाणु शक्ति संपन्न देश में इस तरह की अर्ध-बर्बर शासन व्यवस्था का लागू होना उस देश के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए कितनी खतरनाक बात है, एकबारगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। यहां हाल ही में प्रकाशित एक अमेरिकी रणनीतिकार की किताब में उद्धृत एक तथ्य को ध्यान में रखें तो इस खतरे की एक झलक महसूस की जा सकती है। उक्त किताब में भरोसेमंद सूत्रों को आधार बनाते हुए बताया गया है कि करगिल युद्ध में अपनी पिटाई तय जानकर पाकिस्तानी फौज ने भारत के खिलाफ परमाणु बम इस्तेमाल करने का मन बना लिया था। गौरतलब है कि उस समय पाकिस्तान में नवाज शरीफ की हुकूमत थी और अमेरिकी दबाव से किसी तरह कगार पर खड़ा मामला काबू में आ गया। आज जब वहां हुकूमत के सारे तौर फौजियों के ही हाथ में हैं तो कब क्या हो जाएगा, कौन जानता है। विडंबना यह है कि इसका दूसरा पहलू और भी ज्यादा खतरनाक है। पाकिस्तान के उत्तरी और पश्चिमी कबीलाई इलाकों में एक अर्से से डेरा जमाए इस्लामी आतंकवादी तत्व लाल मस्जिद की घटना के बाद से राजधानी इस्लामाबाद और आर्थिक राजधानी कराची समेत पूरे पाकिस्तान में अपनी धमक जमा चुके हैं। समाज की तरफ से इकलौता विरोध उन्हें अभी तक देश के पढ़े-लिखे शहराती मध्यवर्ग की तरफ से झेलना पड़ रहा था, लेकिन मुशर्रफ के अघोषित मार्शल लॉ से उसके एक हिस्से की सहानुभूति भी इस शासन के खिलाफ लड़ रही जेहादी ताकतों के साथ हो सकती है। इन बारूदी हालात में जेहादी सोच वाले पाकिस्तानी फौज के किसी हिस्से ने अगर कभी मुशर्रफ का तख्ता पलटने का फैसला कर लिया तो यह आतंकवाद से जुड़े दुनिया के सबसे भयावह दु:स्वप्नों के सच होने जैसा होगा। पाकिस्तानी जनता से ज्यादा यह विश्व राजनय की परीक्षा है।

देश में बढती बर्बर घटनाएं

idol_wideweb__470x3340.jpg

देश के कोने-कोने में जिस तरह की घटनाएं घट रही हैं, उन्हें देखकर आसानी से यह कहा जा सकता है कि हमारे देश में आंतरिक तौर पर हलचल है। कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने की घटनाएं बढ़ रही है। भीड़ हर खतरे से बेपरवाह अपना निर्णय सुना दे रही है। अचानक देशभर में ऐसी हिंसक घटनाओं की झड़ी लग गई है, जिनमें आम लोग कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं, इस साल बिहार के वैशाली जिले में 13 सितंबर को लोगों की एक भीड़ ने 10 व्यक्तियों को पीट-पीटकर मार दिया। इनके बारे में संदेह था कि वे चोर हैं। इसके एक सप्ताह के भीतर ही दो और लोगों को पटना के सुलतानगंज इलाके में पीट-पीटकर मार डाला गया। महाराष्ट्र के लोनावाला में पांच मजदूरों को मामूली से पैसों के झगड़े में मार डाला गया। केरल में भीड़ ने चोरी के संदेह में दो महिलाओं पर हमला कर दिया। इन महिलाओं में से एक गर्भवती थी और एक उसकी बेटी थी। प्रधानमंत्री को पुलिस प्रमुखों की राष्ट्रीय बैठक में भीड़ द्वारा अंजाम दी गई इन वारदातों पर चिंता जतानी पड़ी।
ये घटनाएं देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में लोगों के विश्वास की कमी को दर्शाती हैं। आखिर क्या चीज है, जो लोगों को दूसरों को पीटने, खामोश कर देने और जान से मार डालने के लिए मजबूर कर देती है? अक्षम पुलिस, लचर अभियोजन, सुस्त न्यायपालिका और वे जेलें- जहां से डॉन किस्म के लोगों को सुरक्षित घेरे से अपनी गैर-कानूनी हरकतें जारी रखने की छूट मिल जाती है। यही वे वजहें हैं, जिनके चलते लोगों का कानून से विश्वास उठ गया है। न्यायिक सुधारों पर बनी मालीमथ समिति हमें बहुत पहले 2004 में ही यह चेतावनी दे चुकी है कि आपराधिक न्याय प्रणाली ‘लगभग ढह चुकी है’ कि यह ‘सुस्त, अक्षम और अप्रभावी’ है और इस कारण ‘व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है।’ समिति ने इसे सुधारने के लिए सिफारिशें की थीं, जो दुर्भाग्य से मानवाधिकारवादी कार्यकर्ताओं और नागिरिक स्वंत्रता के मसीहाओं के भेष में घूमने वाले निहित स्वार्थी तत्वों के विरोध के शोर के कारण रद्दी की टोकरी में डाल दी गईं, और बहुवांछित सुधारों को फिर अटका दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के कामकाज में व्यापक सुधारों के लिए 22 सितम्बर, 2006 को खास दिशा-निर्देश जारी किए थे। कई राज्यों ने इन्हें लागू भी कर दिया, लेकिन बड़े राज्यों ने इन्हें या तो लागू ही नहीं किया, या वे लागू करने का स्वांग करते रहे। गुजरात ने यह रूख अपना लिया कि इन्हें लागू करने से संविधान का संघीय चरित्र प्रभावित होगा। महाराष्ट्र ने तर्क दिया कि ये दिशा-निर्देश वैधानिक प्रावधानों के खिलाफ हैं, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में इनका प्रतीकात्मक अनुपालन कर दिया गया, जबकि बिहार में एक कानून पारित कर दिया गया, जो बेहद दकियानूसी था। दुर्भाग्यवश सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को लटकाने, बेदम करने और संभवत: उन्हें पटरी से उतारने की हरचंद कोशिश की गई।
सुधारों का प्रतिरोध हर तरफ से है। नेता और अफसरशाह यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर हैं, क्योंकि इससे आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न हिस्सों पर उनका दबदबा बढ़ता है। दूसरी आ॓र मनवाधिकारवादी जमात अपराधियों और आतंकवादियों के अधिकारों से ज्यादा कुछ सोच ही नहीं सकती। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि जिस परिवेश में समाज औपनिवेशिक युग के बने कानूनों पर निर्भर है और जहां सुधारों की प्रक्रिया को अदूरदर्शी अफसरशाही और दृष्टिहीन नेताओं ने लटका रखा है, वहां न्याय की अपेक्षा करने वाले लोग हताशापूर्ण उपायों का सहारा लेते हैं, नक्सलवादी जन अदालतें चलाते हैं, जहां कठोर लेकिन तुरंत फैसला कर दिया जाता है। वे तो आदमी की ऊंचाई नौ इंच कम करने (दूसरे शब्दों में सिर कलम कर देने) पर जश्न मनाते हैं। इसी तरह अन्य लोग, जो आपराधिक न्याय प्रणाली पर विश्वास खो चुके हैं, अपनी तरह का न्याय कर देते हैं।
भीड़ के न्याय को समाज में किसी ढांचागत त्रुटि को सुधारने या दूर करने के उद्देश्य से नैतिक तौर पर विरोधाभासी आचरण कहकर परिभाषित किया गया है। हम इन दिनों जिस तरह की भीड़ की हिंसा देख रहे हैं, वह हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में ढांचागत त्रुटियों के खिलाफ एक तरह का विरोध प्रदर्शन है। भीड़ के न्याय की हरकतें हर हाल में लोकतंत्र और कानून के शासन के लिए एक खतरा हैं।
ऐसा नहीं है कि बाकी देश इस तरह की घटनाओं से मुक्त हैं। अमेरिका में भीड़ के न्याय की प्रवृति अठारहवीं सदी में देखी गई थी। जिसमें उचित कानूनों के अभाव में कुछ स्वैच्छिक संगठन इकट्ठे होकर उन लोगों को पीटते, प्रताड़ित करते और जान से मार देते थे जिन्हें वे अपने समुदाय के लिए खतरा मानते थे। यह प्रवृति 1920 और 1970 के दशकों में दोबारा नजर आई, जिसे विशेषज्ञों ने नव चौकीदारीवाद कहा। 1920 के दशक में जब चीन में व्यापक अव्यवस्था थी, बिग स्वर्ड सोसाइटी लोगों की जान-माल की रक्षा करती थी। फिलीपींस में दावाओं डेथ स्क्वाड शहर के कथित खतरनाक अपराधियों का सफाया कर देता था। अल सल्वाडोर में पुलिस और सेना के रिटायर्ड अफसरों के एक समूह ने देश से ‘अपवित्र’ तत्वों की सफाई का बीड़ा उठा लिया।
यह सब बताने का उदे्देश्य चौकीदारीवाद को या लोगों द्वारा किसी भी तरह के त्वरित न्याय को उचित ठहराना नहीं है। यह एक जंगली न्याय था और है, जिसमें कोई ढांचागत प्रक्रिया नहीं होती, कोई तय कानून नहीं होते और जिसमें आरोपी को अपने बचाव का शायद ही कोई मौका मिलता है। किसी भी सभ्य समाज में ऐसे बर्बर न्याय के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। भारत जैसी उभरती हुई ताकत और लोकतंत्र में तो कतई नहीं। इस प्रवृति को तुरंत रोका जाना चाहिए अन्यथा यह अराजकता की हालत पैदा कर सकती है। पुलिस को अपना वैध कार्य अवश्य करना चाहिए और उसके लिए आवश्यक ढांचागत परिवर्तन किए जाने चाहिए। इसका दीर्घकालिक उपाय यही है कि आपराधिक न्याय प्रणाली को चुस्त किया जाए और कानून के शासन को चुस्ती से एक समय सीमा के भीतर और समुचित ढंग से लागू किया जाए।
इस व्यवस्था को लागू करने पर ढेर सारे अपराध अपने आप कम हो जाएंगे। भीड़ द्वारा किसी अपराधी को पीट-पीट कर मार डालना किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक की बात है। इसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। यदि इसी तरह से न्याय दिया जाएगा तो वह जंगल राज होगा, न कि सभ्य समाज। अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस के काम का बंटवारा होना चाहिए। कानून-व्यवस्था का अनुपालन कराने वाली पुलिस अलग हो और इंवेस्टीगेशन पुलिस अलग। मालीमथ समिति की रिपोर्ट इस दिशा में सराहनीय कार्य कर सकती है। उसे जल्द से जल्द लागू करना होगा।

Published in:  on November 12, 2007 at 10:47 am Leave a Comment

आतंकवाद और पाकिस्तान

pakistan_terror_main1.jpg

9/11 के बाद से दुनिया भर के रणनीति विशेषज्ञों के बीच पाकिस्तान की चर्चा आतंकवाद की नई धुरी के रूप में होने लगी है। बीच-बीच में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ऐसी ब्योरेवार खबरें प्रकाशित हो रही हैं कि कैसे पाकिस्तान में आतंकवादियों को अपनी गतिविधियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना हासिल हो रहा है। अमेरिका भी अपने आतंकवाद विरोधी युद्ध के हिस्से के रूप में अंतरराष्ट्रीय सीमाएं पार कर पाकिस्तान के भीतर आतंकवादियों पर सीधी चढ़ाई करने के बारे में सोच रहा है। इस उभरती हुई नई परिस्थिति में जिस पहले सवाल का जवाब खोजने की जरूरत है, वह यह है कि पाकिस्तान आखिर कैसे एक आतंकवाद प्रायोजक राज्य में बदल गया?
इस सवाल का जवाब ढ़ंढते हुए संक्षेप में पाकिस्तान के इतिहास का जायजा लेना जरूरी है। स्वतंत्र होने के कुछ ही महीनों के भीतर पाकिस्तानी फौज इस नतीजे पर पहुंच गई कि अनियमित युद्ध को उसे राज्य कौशल का एक अंग मानकर चलना होगा। इस नीति की पहली झलक अक्टूबर 1947 में भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य में पाकिस्तानी घुसपैठ के रूप में देखने को मिल गई। पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक यह घुसपैठ लश्करों द्वारा की गई। यह एक अलग ही कहानी है कि लश्करों को जरिया बनाकर संपा की गई इस गतिविधि का कोई फायदा उस समय पाकिस्तान को नहीं मिला।
बहरहाल, अगले तीस वषा में पाकिस्तान ने यह विकल्प खुला रखा। अफगानिस्तान में सोवियत दखल के बाद 1981 में इस अवधारणा को पुनर्जीवित करने का पहला अवसर उपलब्ध हुआ।
शीतयुद्ध की राजनीति के तहत अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप के लिए उसे सबक सिखाने का फैसला किया। अफगानिस्तान में चले इस अघोषित युद्ध में कई देशों ने हिस्सा लिया। पाकिस्तान में मौजूद अफगान शरणार्थी रातोंरात मुजाहिदीन बन गए। अमेरिका के सबसे तेज-तर्रार दिमागों ने इन मुजाहिदीनों की दीक्षा के लिए विचारधारात्मक पृष्ठभूमि तैयार की। सऊदियों ने इन मुजाहिदीनों को छापामार युद्ध में प्रशिक्षित करने के लिए भरपूर वित्ताीय सहायता प्रदान की। पाकिस्तान ने स्वेच्छा से खुद को सोवियत संघ के विरूद्ध अमेरिकी नेतृत्व में चलने वाले इस युद्ध के लिए खुद को अग्रिम मोर्चे के देश के रूप में प्रस्तुत किया। अमेरिका और सऊदी अरब द्वारा समूची इस्लामी दुनिया में अपील जारी की गई कि बतौर खुदाई खिदमतगार लोग मुजाहिदीन कतारों में शामिल हों। इस अपील के असर में मुजाहिदीन के साथ आ जुड़ने वालों में एक नाम आ॓सामा बिन लादेन का भी था।
एक आकलन के अनुसार सोवियत संघ के विरूद्ध पूरे आठ साल चले इस युद्ध में 120 देशों ने हिस्सेदारी की और पाकिस्तानी फौज के जरिए मुजाहिदीनों को एक लाख टन हथियार और गोला-बारूद की आर्पूित की गई। इस प्रक्रिया में पाकिस्तानी सैन्य बलों और गुप्तचर संस्थाओं की मुजाहिदीनों के साथ बनती एकता को भी रेखांकित किया गया। 1988 में अफगानिस्तान से सोवियत वापसी के बाद करपंथी इस्लामी विचारधारा अपना चुके कुछ मुजाहिदीन गुटों ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि वे एक महाशक्ति (सोवियत संघ) को परास्त कर चुके हैं और अपनी विचारधारात्मक प्रेरणा से वे संसार की किसी भी ताकत को हरा सकते हैं।
दरअसल, पाकिस्तानी सत्ताा प्रतिष्ठान में बैठे बहुत सारे लोग भी यह मानने लगे थे कि इन करपंथी इस्लामी गुटों के जरिए वे अपने बहुतेरे सैन्य उद्देश्यों की र्पूित कर सकते हैं। यहां तक कि बेनजीर भुो और नवाज शरीफ जैसे निर्वाचित प्रधानमंत्रियों का नजरिया भी कुछ ऐसा ही हो चला था। बेनजीर की कैबिनेट में शामिल गृहमंत्री लेफ्टिनेंट जनरल नसरूल्ला बब्बर ने आईएसआई और डीएमआई के साथ मिलकर 1990 के दशक के प्रारंभ में तालिबान की वैचारिक रूपरेखा तैयार की और मुल्ला उमर को इसका मुखिया चुना। अगले एक दशक की अवधि में पाकिस्तान-अफगानिस्तान संसार भर में करपंथी इस्लामी गुटों की प्रजनन भूमि के रूप में स्थापित हो गए। एक आकलन के मुताबिक पाकिस्तान में तब 60 हजार मदरसे काम कर रहे थे और हर मदरसे में कम से कम 200 छात्र पवित्र ग्रंथ का अध्ययन कर रहे थे। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब एक करोड़ लोग इन मदरसों में पढ़ रहे थे। उनका दस प्रतिशत भी जेहादी गुटों से जुड़ा हो तो यह संख्या दस लाख ठहरती है।
इन सभी गतिविधियों का वित्तापोषण नशीले पदाथा के व्यापार, अमीर अरब देशों द्वारा पूरी फराखदिली से मुहैया कराई जा रही मदद और दानदाता संगठनों के जरिए हो रहा था। शुरू में सोवियत संघ के विरूद्ध जारी लड़ाई के दौरान अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा बहुतायत में उपलब्ध कराए गए हथियार जेहादियों के बड़े काम आए। बाद के सालों में सोवियत संघ के विघटन से भी जेहादियों को हथियार खरीदने का एक बड़ा स्रोत हासिल हो गया।
1990 के दशक में विभिा जेहादी संगठनों के बीच चली बहसों से यह विचार उभरता दिखाई पड़ा कि अमेरिका मुख्य शैतान है और वह इस्लामी दुनिया की संपदा का शोषण कर रहा है। फरवरी 1998 में आ॓सामा बिन लादेन द्वारा अमेरिका और इजराइल के विरूद्ध युद्ध के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना की गई, जिसके तुरंत बाद दुनिया भर में मौजूद अमेरिकी परिसंपत्तिायों पर हमलों की एक पूरी श्रृंखला देखने को मिली। इसकी परिणति 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और वाशिगटन डीसी स्थित पेंटागन पर हुए हमलों में हुई।
करपंथी इस्लामी गुटों द्वारा किए गए इस हमले की प्रतिक्रिया में अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जिस युद्ध की शुरूआत की, उसके अभी तक सीमित नतीजे ही हासिल हो सके हैं। अक्टूबर 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले मेें वहां काम कर रहे करपंथी इस्लामी गुटों के कई अड्डे और उनका जमीनी ढांचा नष्ट हो गया। अमेरिकी युद्ध ने पाकिस्तानी सैन्य बलों को अपने काफी नजदीकी तालिबान और अल-कायदा जैसे संगठनों पर से अपनी छत्रछाया हटाने को मजबूर कर दिया। एक पर्यवेक्षक के अनुसार पाकिस्तानी फौज में तालिबान/अल-कायदा के समर्थन को लेकर ऊपर से नीचे तक दो-फाड़ हो जाने की नौबत आ गई है। माना जा रहा है कि पाकिस्तानी सैन्य बलों में 40 प्रतिशत से ज्यादा लोग तालिबान और अल-कायदा की कर इस्लामी विचारधारा में यकीन रखते हैं। पाकिस्तानी मीडिया में इस आशय की रिपोट अक्सर छप रही हैं कि निचले स्तर के खुफिया कर्मी सैन्य बलों द्वारा संभावित हमलों की अग्रिम सूचना तालिबान और अल-कायदा के कार्यकर्ताओं तक जल्द से जल्द पहुंचा देते हैं।
हाल के वषा में, खासकर सन् 2007 की शुरूआत से ऐसी कई रिपोट आई हैं, जिनमें बताया गया है कि किस तरह तालिबान और अल-कायदा ने क्वेटा (बलूचिस्तान), पेशावर (उत्तार-पश्चिमी सीमाप्रांत) और वजीरिस्तान जैसे संघ प्रशासित कबाइली क्षेत्रों में अपने लिए आरामदेह इलाके कायम कर लिए हैं।
न्यूजवीक में हाल ही में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक आज की दुनिया में पाकिस्तान सबसे खतरनाक जगह है। न्यूजवीक का कहना है, ‘अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों के बरक्स पाकिस्तान के पास ऐसी हर चीज है, जिसकी इच्छा अल-कायदा प्रमुख आ॓सामा बिन लादेन को हो सकती है: राजनीतिक अस्थिरता, इस्लामी चरमपंथियों का एक भरोसेमंद ढांचा, पश्चिम-विरोधी क्रुद्ध रंगरूटों की बहुतायत, एकांत में स्थित प्रशिक्षण क्षेत्र और ऐसे सुरक्षा सेवाएं, जो हमेशा वह नहीं करतीं, जो करने की उम्मीद उनसे की जाती है।’
इसके अलावा पाकिस्तान की नाभिकीय महत्वाकांक्षाओं की भी कोई सीमा नहीं है। पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम के जन्मदाता ए. क्यू. खान ने समूची इस्लामी दुनिया में नाभिकीय हथियार बनाने का बाकायदा एक गुप्त ढांचा तैयार कर दिया था, ताकि शैतानी ताकतों के खिलाफ इस दायरे में ज्यादा से ज्यादा नाभिकीय शक्तियों को खड़ा किया जा सके। यह ढांचा अपनी शुरूआत में ही पकड़ में आ गया, लेकिन नाभिकीय अस्त्र विस्तार के मामले में तबतक काफी नुकसान हो चुका था। पाकिस्तान आज जितनी अस्थिर परिस्थिति से गुजर रहा है, आतंकवाद यहां के माहौल में जितने भयंकर रूपों में अभिव्यक्ति पा रहा है, उसे देखते हुए इसके नाभिकीय आतंकवाद का केंद्र बन जाने की पूरी संभावना है। अंतरराष्ट्रीय रणनीति विशेषज्ञों के मुताबिक इससे बुरा परिश्य और कोई हो नहीं सकता।
यहां भारत में साउथ ब्लॉक में बैठे अधिकारियों को पाकिस्तान में हो रहे इन विकासों पर कड़ी नजर रखनी होगी, ताकि नाभिकीय आतंकवाद के मुकाबले के लिए वे अभी से कुछ जरूरी नीतियां सूत्रबद्ध कर सकें।

Published in:  on November 11, 2007 at 9:14 am Comments (1)